Tuesday, June 14, 2011

अटका वामपंथ व्यवहारवाद और बाजारवाद के बीच


पश्चिम बंगाल में राजनीतिक उलट-पुलट को क्या नाम दिया जाए? एक प्रतिबद्ध राजनीतिक विचारधारा की पराजय या सुशासन की उम्मीद में कुशासन का निष्कासन। कोई भी ऐतिहासिक घटना केवल किसी एक बिंदु पर आधारित नहीं होती। दिखने में जो कथित क्रांतियां एक मुद्दे पर टिकी होती हैं, गहराई से जांचने पर उन के बहुआयाम भी सामने आते हैं। पश्चिम बंगाल में वामपंथ हारा कहने भर से इस युग परिवर्तन की व्याख्या करना सही नहीं होगा। दुनिया में वामपंथ के दूसरे बड़े दुर्ग तो कब के ढह चुके थे और जिन देशों में साम्यवाद अब भी सत्ता में है वहां भी वह कायाकल्प की प्रक्रिया में रहा है। वहां वह ऐसा रूप लेने का प्रयास करता रहा है जो आधुनिक पूंजीवादी व्यवस्था के साथ किसी किसी स्तर पर सहयोग और तालमेल बनाने में सफल रहे। चीन में कहने को साम्यवादी राजनीतिक व्यवस्था है लेकिन आर्थिक स्तर पर वह पश्चिम की उपभोक्ता संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। तात्कालिक परिस्थितियों के संदर्भ में देखें तो पश्चिम बंगाल में विचारधारा के स्तर पर तो शुद्ध साम्यवाद था ही नहीं। पश्चिम बंगाल के साम्यवादी भी बदलना चाहते थे, बदल भी रहे थे। उन्हें भी मालूम था कि जमींदारी उन्मूलन और कृषि सुधार की महत्वपूर्ण उपलब्धियों से अर्जित पूंजी से ही बदलते हुए परिवेश में पार्टी और विचारधारा को पोषण नहीं मिल सकता है।
बदलने के पहले ही गिरी गाज
भारत समाजवादी देश नहीं रहा, उस ने उपभोक्तावाद का वरण कर लिया है। अब वह भी भूमंडलीकरण के गीत गाता है। ऐसे में आधारभूत कृषि व्यवस्था और उद्योगहीनता में राज्य की अर्थव्यवस्था नहीं चल सकती है। ज्योति बसु के बाद से पश्चिम बंगाल में औद्यौगिकीकरण की प्रक्रिया तेज हो गई थी। बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सिंगुर में टाटा को न्योत कर एकदम कोई नई परम्परा नहीं डाली थी। राज्य में उद्योगपतियों को आमंत्रित करने और उन्हें सुविधाएं देने के प्रयास तो पहले ही होने लगे थे लेकिन वामपंथियों को बदलने का मौका नहीं मिला। गाज उस से पहले ही गिर गई।
विचारधारा की कठोरता है जिम्मेदार
राजनीति में विचारधारा तो यों भी मर रही हैं लेकिन अधिकतर राजनीतिक नेता और दल अभी विचारधारा का आवरण ओढ़कर चलते हैं। तो उन की विचारधारा तर्कसंगत रह गई है और ही देश की राजनीति को चलाने और सत्ता पाने में उसका कोई औचित्य रह गया है। गांधीवाद का ढोल पीटने वाली कांग्रेस को किस मानक से गांधीवादी कह सकते हैं? भाजपा हीसांस्कृतिक राष्ट्रवादकी कौन सी व्याख्या कर पा रही है? दोनों दलों की विचारधारा तो केवल स्वहितवाद ही है। जिस भी मार्ग से सत्ता तक पहंचा जा सके, वही सही रास्ता है।लेकिन वामपंथियों की विचारधारा जितनी परिभाषित, जितनी अनुशासित, जितनी तर्काधारित थी उसे उतनी ही आसानी से उतार कर फेंका नहीं जा सकता था जितनी आसानी से कांग्रेस-भाजपा अपना चोला बदल सकती थीं।
नये राजनीतिक तंत्र का सूत्रपात नहीं
पश्चिम बंगाल के वामपंथियों को साम्यवाद से बाजारवाद में प्रवेश करने के लिए जिस राजनीतिक तंत्र की आवश्यकता थी, वे उस का विकास कर नहीं पाए। पार्टी के स्तर पर वही प्रतिबद्ध कैडर, जनभावना की वही अवहेलना, विरोध और असहमति के प्रति वही असहिष्णुता बनी रही जो साम्यवादी सत्ता के लम्बे दौर का स्वाभाविक परिणाम होता है। बदलाव की ऐसी ही प्रक्रिया में सोवियत संघ टूट गया। चीन इसलिए बदलाव को पचा रहा है क्योंकि उस ने अपने आप को दुनिया से काट कर अपनी शतरे पर हालात को नियंत्रित कर लिया। दोनों अलग प्रभुसत्ता सम्पन्न देश थे। पश्चिम बंगाल तो बाजारवाद से अलग रह नहीं सकता था। वह भारतीय समुद्र का टापू बन कर कब तक जी सकता था। दूसरे साम्यवादी देशों ने जो किया सो किया पश्चिम बंगाल तो
औद्यौगिकीकरण के वह उपाय भी नहीं कर पाया जो अन्य राज्यों ने किए थे।
वोटरों को दूसरे राज्यों ने किया प्रभावित
गुजरात तो परम्परागत रूप से औद्यौगिक राज्य रहा है। उद्योग और व्यापार गुजरात का स्वभाव है लेकिन मध्य प्रदेश जैसे राज्य तो इस मामले में बहुत अनुभवी नहीं हैं। फिर भी उस में एक गति दिखती है। बिहार ने भी करवट बदलना आरम्भ कर दिया है। यह सब मतदाता की नजरों से छिपा नहीं था। पश्चिम बंगाल का मध्यवर्ग हो या किसान, वह जानता था कि जिस पार्टी और सरकार में कम से न्यूनतम रोजगार और भरण पोषण की व्यवस्था की कभी गारंटी हुआ करती थी उसकी प्राथमिकताएं बदल गई हैं। जिन कैडर के बल राज्य में कृषि क्रांति आई थी, वही कैडर दमन का वाहक भी बन गया है। पश्चिम बंगाल में राजनीतिक बदलाव का श्रेय ममता बनर्जी को दिया जा रहा है। लेकिन ममता वही बातें पांच साल पहले भी करतीं थीं जो उन्होंने इस चुनाव के दौरान मतदाताओं को कहीं। तब वे वामपंथियोें के लिए केवल एक अडं़गेबाज राजनेता ही बन पाई लेकिन आज एक आंधी की संवाहक बन
गई। पिछले पांच साल वामपंथ के लिए संक्रांति काल था, जब कि साम्यवादी विचारधारा से बाजारवादी व्यवस्था में संक्रमण करने की कोशिश हो रही थी। व्यावहारिकता के अवतार बुद्धदेव औद्यौगिकीकरण के आगमन की घोषणा एक विराट मंच से करना चाहते थे। सिंगुर वह मंच था पर वामपंथी भूल गए कि इस बार उन्होंने उन्हीं किसानों को खलनायक बना लिया था जिन को नायक बता कर तीन दशक पहले किसानों का कायाकल्प कर लिया था। सरकारों ने किसानों से उद्योगों के लिए जमीन कौन से राज्य में नहीं छीनीं? राज्य सरकारें तो आज भी बिल्डरों के लिए किसानों से जमीनें छीन रही हैं। कौन से राज्य के किसानोें ने इस पर नाराजगी नहीं व्यक्त की लेकिन सिंगुर केवल पश्चिम बंगाल में हुआ। इसलिए पश्चिम बंगाल में तख्तापलट एक ऐसी विचारधारा के क्रमिक पराभव के कारण हुआ, जो अब प्रासंगिक नहीं रह गई थी। लेकिन वामपंथियों की पराजय मतदाता के इस निष्कर्ष के कारण भी हुई कि व्यवहारवाद और बाजारवाद इस दौर में रोजी-रोटी और कानून व्यवस्था ही उस की प्राथमिकता है। इस कसौटी पर वाममोर्चा खरा नहीं उतरा।

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