Tuesday, June 14, 2011

हारे हैं, ख़त्म नहीं


पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चा की भारी हार हुई है। 1977 से एक के बाद एक लगातार सात चुनाव जीतने के बाद, माकपा के नेतृत्व वाले वाम मोर्चा को सत्ता से हटाया गया है जो रिकॉर्ड 34 वर्ष से सरकार में था। इससे देश की वामपंथी, जनतांत्रिक तथा प्रगतिशील ताकतों को बड़ी निराशा हुई है। राज्य की जनता ने निर्णायक रूप से बदलाव के पक्ष में फैसला लिया है और तृणमूल कांग्रेस के गठजोड़ को जबर्दस्त जीत दिलाई है। पश्चिम बंगाल की हार के बाद नैगम मीडिया में माकपा तथा वामपंथ के खिलाफ प्रचार की बाढ़ गई है। कहा जा रहा है कि ये चुनाव नतीजे माकपा के लिए सर्वनाश के सूचक हैं और पार्टी इस पराभव से अब कभी उबर नहीं पाएगी। इसी क्रम में कुछ टिप्पणीकारों ने हमले की यह दिशा पकड़ी है कि कम्युनिस्ट विचारधारा तो पहले ही पुरानी पड़ने के चलते अप्रासंगिक हो चुकी थी और इस बार का विधानसभा चुनावों का जनादेश, दुनिया भर में समाजवाद तथा मार्क्सवाद की प्रासंगिकता के खत्म होने की प्रक्रिया का ही चरमोत्कर्ष है। ये दावे सरासर निराधार हैं।
बेशक, माकपा चुनाव नतीजों की चौतरफा समीक्षा कर रही है ताकि उन कारणों की पहचान की जा सके जिनके चलते वाम मोर्चा के समर्थन में कमी आई है और बंगाल में राजनीतिक हालात में बदलाव आया है। सभी जानते हैं कि धुर-दक्षिणपंथ से लेकर अतिवामपंथ में माओवादियों तक, तमाम वामपंथ विरोधी ताकतें इस चुनाव में वाम मोर्चा के खिलाफ पूरी तरह से एकजुट हो गई थीं। फिर भी इस चुनाव में भी वाम मोर्चा 2009 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले 11 लाख वोट ज्यादा हासिल करने में कामयाब रहा है। लेकिन, कुल वोट में उसके हिस्से में लोकसभा के चुनाव के मुकाबले 2. 2 फीसद की गिरावट हो गई। साफ है कि पिछले दो साल में .बंगाल में वाम मोर्चा अपने खोए हुए जनाधार को उस हद तक दोबारा हासिल नहीं कर पाया, जिस हद तक हम उम्मीद कर रहे थे।
बहरहाल, जो लोग माकपा तथा . बंगाल में वामपंथ के लिए मृत्युलेख लिखने में लगे हुए हैं, वे इस तथ्य को भूल जाते हैं कि इस हार में भी वाम मोर्चा को राज्य में पड़े कुल वोट में से 41 फीसद से ज्यादा हिस्सा मिला है। एक करोड़ 95 लाख से ज्यादा लोगों ने वाम मोर्चा के पक्ष में वोट दिया है और उसे अपना समर्थन दिया है। यह एक प्रभावशाली जनाधार है। यह जनाधार, पिछले दो वर्षो में माकपा तथा वामपंथ पर बढ़ते हमलों के बावजूद कायम रहा है। यह मेहनतकश जनता के बीच कायम वर्गीय आधार है।
बेदखली के पीछे नकारात्मक प्रभाव
वामपंथ के तीन दशक के शासन की शानदार उपलब्धियों के बावजूद, सरकार के लंबे अर्से तक बने रहने से कुछ नकारात्मक कारक भी एकत्र हो गए थे। पार्टी के राजनीतिक सांगठनिक काम के संदर्भ में रखकर, चुनाव नतीजों की आलोचनात्मक समीक्षा के जरिए हम, ऐसे कदम तय कर पाएंगे जिनके सहारे हम अपने रुख की खामियों को दूर सकते हैं और सांगठनिक कमजोरियों का उपचार कर सकते हैं। माकपा तथा वामपंथ धीरज के साथ जनता के उन तबकों को फिर से अपने साथ जोड़ने के लिए संघर्ष करेंगे, जो उनसे अलग हो गए हैं। याद रहे कि .बंगाल में माकपा तथा के वाम मोर्चा का निर्माण विकास, चार दशक से ज्यादा में फैले अनगिनत संघर्ष जनांदोलनों के बीच से हुआ है। वाम मोर्चा की चुनावी सफलता, इस तरह के आंदोलनों संधषरे से निर्मित जनाधार का ही नतीजा है। तो बंगाल में वाम मोर्चा सिर्फ एक चुनावी गठबंधन है और माकपा सिर्फ अपनी चुनावी गतिविधियों के बल पर एक शक्तिशाली जन पार्टी के रूप में बढ़ी तथा विकसित हुई है।
केरल में एंटी इन्कम्बन्सि फैक्टर नहीं
उधर, केरल में एलडीएफ अब तक के सबसे मामूली अंतर से हारा है। वह बहुमत से सिर्फ तीन सीट पीछे रह गया है। यूडीएफ दो सीट की बढ़त से किसी तरह जीत दर्ज कराने में कामयाब रहा है। यूडीएफ और एलडीएफ के वोट के हिस्से में कुल 0.89 फीसद का अंतर रहा है। साफ है कि राज्य की जनता आमतौर पर एलडीएफ सरकार के रिकार्ड से संतुष्ट थी और किसी तरह का सत्तारूढ़ताविरोधी कारक यहां काम नहीं कर रहा था। शुरुआती रिपोर्टे यह दिखाती हैं कि जनता के एक हिस्से पर कुछ जातिवादी धार्मिक संस्थाओं को जो प्रभाव हासिल है, उसने ही इस चुनाव में एलडीएफ की जीत का रास्ता रोका है। जहां तक विचारधारा का सवाल है, माकपा भारत की ठोस परिस्थितियों में रचनात्मक रूप से उसका व्यवहार करने के अर्थ में ही, मार्क्सवाद के सिद्धांत तथा व्यवहार को अपना आधार बनाती है। यह कोई अचल रुख नहीं है बल्कि एक निरंतर विकसनशील रुख है। इसीलिए, सोवियत संघ के पराभव पर माकपा पर कोई वास्तविक प्रभाव नहीं पड़ा था। वास्तव में पिछली सदी के नौंवे दशक में पश्चिम बंगाल तथा केरल, दोनों में ही पार्टी का तेजी से फैलाव तथा विकास हुआ। माकपा ने, जहां कहीं भी उसे जनता का समर्थन मिल पाए, राज्य सरकारें चलाने के लिए अपना ही रुख विकसित किया है। इसके तहत वामपंथी नेतृत्ववाली सरकारों को इस तरह चलाना होता है, जिससे वामपंथी जनतांत्रिक आंदोलन को और मेहनतकश जनता के आंदोलन को बल मिले।
हम जनतंत्र की अविचल शक्ति
माकपा और वामपंथ ने साबित किया है कि वे जनतंत्र के पक्ष में काम करने वाली सबसे अविचल शक्ति हैं। 1957 में केरल में कम्युनिस्ट पार्टी के चुनाव में जीतने और देश में पहली कम्युनिस्ट सरकार बनाने के बाद से ही कम्युनिस्ट, अवाम के विशाल हिस्सों को जनतांत्रिक प्रक्रिया में खींचने के जरिए, जनतंत्र में नई जान फूंकने में लगे रहे हैं। यह संयोग ही नहीं है कि हमारे देश में सबसे ज्यादा मतदान पश्चिम बंगाल, केरल तथा त्रिपुरा में ही होता है। देश के यही तीन राज्य हैं जहां भूमि सुधारों ने पुरानी भूस्वामी व्यवस्था के ढांचे को तोड़ा है और जनतंत्र का विस्तार किया है। इन राज्यों में पंचायती राज संस्थाओं में नई जान फूंकी गई है। .बंगाल में बदली हुई परिस्थितियों में माकपा, वाम मोर्चा के शासन में तीन दशक से ज्यादा में जनता को हासिल हुई उपलब्धियों की रक्षा करेगी। बहरहाल, चुनाव के बाद, सबसे पहला काम तो यही है कि पार्टी, वाम मोर्चा तथा पश्चिम बंगाल में आंदोलन की रक्षा की जाए, जिन पर नए हमले शुरू भी हो चुके हैं। तृणमूल कांग्रेस चुनावी जीत का फायदा उठाकर अनेक इलाकों से माकपा तथा वामपंथ का भौतिक रूप से ही सफाया करना चाहती है। पश्चिम बंगाल की जनता की जनतांत्रिक भावनाओं को सामने लाकर और समूची पार्टी, वामपंथ तथा देश की तमाम जनतांत्रिक शक्तियों को एकजुट कर, इन हमलों का मुकाबला किया जाएगा।


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