Tuesday, June 14, 2011

जनतंत्र तक जाता है यह खतरा


अब लेफ्ट की क्या प्रासंगिकता रह गई है? हाल के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद से यह जुमला बार-बार सुनने को मिल रहा है। इसके लिए ज्यादा मसाला बंगाल में वाम मोर्चा की हार से ही मिला है; वरना केरल की राजनीति का - भी जानने वाला यह बता देगा कि सीपीएम के नेतृत्ववाले एलडीएफ की हार में भी, राजनीतिक प्रासंगिकता के हिसाब से उसकी जीत ही छुपी हुई है। कुल तीन सीट और 0.89 फीसद वोट के अंतर से हुई एलडीएफ की हार के पीछे वास्तव में केरल के तीन दशक से ज्यादा के विधानसभा चुनावों के इतिहास में किसी सत्तारूढ़ मोच्रे का सबसे सफल प्रदर्शन छुपा हुआ है।
लगातार सात जीत में है ऐतिहासिकता
केरल के विपरीत, पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा को करारी हार का मुंह देखना पड़ा है। तृणमूल के नेतृत्ववाले गठजोड़ के लगभग 48.5 फीसद वोट और 227 सीटों के मुकाबले, वाम मोर्चा 41 फीसद वोट और 62 सीटों पर ही सिमट कर रह गया है। इसके बावजूद यह हारऐतिहासिक
सिर्फ इसी अर्थ में है कि इसके साथ वाम मोर्चा के लगातार चौंतीस साल से जारी शासन का अंत हुआ है। ऐतिहासिकता सात चुनाव जीतने के अभूतपूर्व रिकॉर्ड में है, इस हार में नहीं। यह तथ्य इस हार की प्रकृति और उससे निकलने वाली चुनौतियों को समझने के लिए जरूरी है।
लेफ्ट खारिज नहीं, पर हार गम्भीर
अगर किसी भी अन्य चुनाव की तरह देखें तो बंगाल में भी हर एक सौ में से 41 से ऊपर वोट और कुल 1 करोड़, 90 लाख से ज्यादा वोट हासिल करने वाले वाम मोच्रे की प्रासंगिकता पर सवाल कैसे उठाया जा सकता है? जब केंद्र की दावेदार दो सबसे बड़ी पार्टियां मिलकर भी 50 फीसद वोट का आंकड़ा पार कर पाती हों, 41 फीसद वोट हासिल करने वाले मोच्रे की प्रासंगिकता पर कौन सवाल
खड़ा कर सकता है? इस सबके बावजूद, पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा की हार का महत्व लेफ्ट के हाथों से सिर्फ एक राज्य सरकार निकल जाने से बहुत-बहुत ज्यादा है। यह संयोग ही नहीं है कि 1977 से लगाकर 2009 के आम चुनाव (वास्तव में 2008 के मध्य के तीन स्तरीय पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव से पहले) तक वाम मोर्चा ने संसद से लेकर पंचायतों तक हरेक चुनाव तथा लगातार वैसे ही भारी बहुमत से और लगभग वैसे ही मत फीसद से जीता था जैसे तृणमूल के नेतृत्ववाले मोच्रे ने मौजूदा चुनाव जीता है। जाहिर है कि बंगाल में वाम मोर्चा का यह जबर्दस्त राजनीतिक वर्चस्व, वाम मोर्चा तथा उसकी सरकार द्वारा इस राज्य के जीवन में, और सबसे बढ़कर ग्रामीण क्षेत्रों में लाए गए उस बुनियादी बदलाव का परिणाम था जिसने मेहनतकशों की नजरों से बंगाल का नक्शा ही बदलकर रख दिया था।
दो दशकों से मिल रही है चुनौती
बहरहाल, नव-उदारवादी नीतियां अपनाए जाने के साथ वामपंथी सरकारों के सामने एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण परिस्थिति खड़ी हुई। बंगाल में यह चुनौती अन्य वामपंथी सरकारों से भी बड़ी थी। कृषि के क्षेत्र में अभूतपूर्व तेजी से विकास को उन्मुक्त करने के बाद, उसे राज्य के औद्योगिक विकास का रास्ता तलाश करना था। यह रास्ता देश के पैमाने पर अमल में लाए जा रहे विकास के नव- उदारवादी रास्ते के बीच से ही निकालना था। संविधान किसी राज्य सरकार को केंद्र सरकार की बुनियादी नीतिगत दिशा से बहुत भिन्न रास्ता अपनाने की इजाजत नहीं देता है।
हमले तेज करने के अवसर मिले
इसी चुनौती से निपटने का ठोस रास्ता निकालने के क्रम में कुछ ऐसी कठिनाइयां पैदा हुई, जिनसे वामपंथ विरोधियों को वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ अपने हमले तेज करने के हथियार मिल गए। उद्योगों के लिए किसानों की जमीन लिए जाने का मुद्दा, खासतौर वाम मोर्चा की गरीब-पक्षधर छवि को ध्वस्त करने वाला अमोघ अस्त्र साबित हुआ। 2008 के पंचायती चुनाव में ऐसी चेतावनी मिल गई थी। 2009 के लोकसभा चुनाव में वाम मोर्चा को पहली बार बाकायदा हार का मुंह देखना पड़ा। अब 2011 के विधानसभाई चुनाव में यह हार और आगे, वाम मोर्चा
सरकार की रिकार्ड पारी खत्म होने तक पहुंच गई है। इस संदर्भ में यह याद रखना जरूरी है कि यह सब बंगाल में वाम मोर्चा सरकार तथा वाम मोर्चा के खिलाफ धुर-दक्षिण से धुर-वाम तक, तमाम लेफ्ट विरोधी ताकतों की अभूतपूर्व और हमलावर एकता के बिना सम्भव नहीं था।
सिंगुर के मुद्दे से शुरू हुई गोलबंदी
यह सिर्फ संयोग ही नहीं है कि यूपीए-प्रथम की सरकार में वामपंथ की नव-उदारवादी नीतियों पर अवाम के हित में अंकुश लगाने की बढ़ती भूमिका के संदर्भ में 2006 के आखिर में सिंगुर को मुद्दा बनाकर यह गोलबंदी शुरू हुई थी। 2007 की शुरुआत के साथ शुरू हुई नंदीग्राम की घटनाओं के बाद और 2008 के जून में लेफ्ट के नाभिकीय सौदे के मुद्दे पर यूपीए-प्रथम से समर्थन वापस लेने के बाद, यह वामपंथ विरोधी एकता मुकम्मल हो गई। 2009 के संसदीय और अब 2011 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-तृणमूल गठजोड़ में इसी को राजनीतिक अभिव्यक्ति मिली है।
कामयाब रही लेफ्ट विरोधी एकता
यह लेफ्ट विरोधी एकता वामपंथी हस्तक्षेप को कमजोर करने और इस तरह नव-उदारवादी नीतियों का रास्ता निरापद करने में बहुत हद तक कायम रही है। इस तथ्य को रेखांकित करना इसलिए खासतौर पर जरूरी है कि नव-उदारवाद का रास्ता और साफ करने के लिए यह एकजुट हमला इन चुनावों के बाद भी धीमा होता नजर नहीं आता है। आखिरकार इन ताकतों को बखूबी पता है कि उनके नव-उदारवाद के रास्ते को आगे बढ़ाने के चलते वामपंथ के लिए इस फौरी धक्के से उबरना कोई बहुत कठिन साबित नहीं होगा लेकिन ठीक इसीलिए इस हमले को वामपंथ के सफाये की मुहिम में तब्दील करने की कोशिशें की जा रही हैं। बंगाल में विधानसभा चुनाव नतीजे आने के साथ ही तृणमूलियों द्वारा छेड़ी गई राजनीतिक हिंसा की मुहिम इसी की ओर इशारा करती है। इन हमलों पर मीडिया के बड़े हिस्सों समेत वामपंथ से इतर अन्य सभी ताकतों की चुप्पी एक खतरनाक संकेत है। विकास के नव- उदारवादी रास्ते के बचाव के लिए जनतंत्र की बलि चढ़ाने की तैयारियां हो रही हैं। एक बार फिर बंगाल से शुरुआत हो गई है।

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