Tuesday, June 14, 2011

विकास का विभ्रम और वाम का भविष्य


तेरह मई को समाज के कई हिस्सों की मुराद पूरी हुई। पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे का किला ढहे, यह उन सबकी साझा हसरत थी। राजनीतिक परिदृश्य पर हम इन समूहों को मोटे तौर पर तीन खंडों में रखकर देख सकते हैं। पहला समूह दक्षिणपंथ का है, जिसकी तमन्ना है कि अगर राजनीति में लेफ्ट कोई ताकत रहे तो फिर राज्य-व्यवस्था एवं उसकी आर्थिक नीतियों को नव-उदारवाद के ढांचे में निर्बाध ढाला जा सकता है। दूसरा हिस्सा चरम वामपंथी समूहों का है जिनकी समझ है कि अगर संसदीय राजनीति में संगठित वामपंथ की उपस्थिति खत्म कर दी जाए तो फिर वामपंथ के पूरे फलक पर वे खुद को फैला सकते हैं। तीसरा खंड अपने को जन आंदोलन और सिविल सोसायटी कहने वाले समूहों का है, जिन्हें लगता है कि संगठित एवं संसदीय वामदलों की अनुपस्थिति में वे एक नए वाम का निर्माण कर सकते हैं और इस तरह अभी की हाशिये पर की अपनी सियासी हैसियत से उभर कर एक नई प्रासंगिकता प्राप्त कर सकते हैं।
वामपंथियों में नहीं है ताकत
इस बात का अनुमान बहुत सहज ढंग से लगाया जा सकता है कि हाल के विधानसभा चुनाव नतीजों से उपर्युक्त तीनों समूहों में से अगर किसी की हसरत सचमुच पूरी हो सकती है तो वह सिर्फ पहला खंड यानी दक्षिणपंथ है। यह हकीकत है कि पश्चिम बंगाल मेंलाल किलाढहने के बाद भारतीय राजनीति में नव- उदारवाद के प्रतिरोध में खड़ा वैकल्पिक ध्रुव काफी कमजोर हो गया है। अगर यह घटनाक्रम इसी रूप में आगे बढ़ा तो देश में लोकतंत्र की जड़ें गहरी होने की प्रक्रिया पर यह जोरदार चोट होगी। इसलिए कि नए लेफ्ट के रूप में उभरने की महत्वाकांक्षा रखने वाले बाकी दोनों समूहों के पास वैसी राजनीति और दृष्टि नहीं है जो व्यवस्था में आम आदमी की भागीदारी को नियंत्रित करने की परिघटना को रोक सके। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा लम्बे समय तक ऐसे मंसूबों के आगे इसलिए अवरोध बना रहा क्योंकि पश्चिम बंगाल में उसके पास अभेद्य दिखने वाला किला था जिसे केंद्र में रखकर वह अपनी राष्ट्रीय भूमिका को स्वरूप दे पाता था। पश्चिम बंगाल के साथ केरल और त्रिपुरा की ताकत इस भूमिका को इतनी महत्वपूर्ण बनाती थी कि बाकी राजनीति उसकी अनदेखी नहीं कर पाती थी। लेकिन सवाल यह है कि आखिर तीन दशक तक मजबूत बने रहने के बाद पश्चिम बंगाल के इस किले में सेंध क्यों लग गई?
विकास की उलझन बुनियादी वजह
कई कारण हैं। कैडर राज, व्यवस्था से असंतोष, पार्टी के सियासी चरित्र में गिरावट आदि बातें एक हद तक सही हैं लेकिन ये बुनियादी कारण नहीं हैं। बुनियादी वजह विकास नीति की उलझन है। वाम मोर्चा सरकार ने पश्चिम बंगाल में भूमि सुधार और पंचायती राज लागू कर सत्ता के विकेंद्रीकरण की ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। मगर वक्त के साथ मुद्दा यह उठा कि इसके आगे क्या? बढ़ती आबादी की जरूरत और न्यूनतम जायदाद हासिल होने के बाद खेतिहर समुदाय की बढ़ी आकांक्षाएं कैसे पूरी की जाएं। रोजगार के नए स्रेत कहां ढूंढे जाएं? लेफ्ट की वजह से पूंजीपति बंगाल छोड़ने लगे थे। राज्य-व्यवस्था में राज्य सरकारों के पास उद्योग धंधे लगाने की उतनी पूंजी नहीं होती जिससे वह सार्वजनिक क्षेत्र का दायरा एक सीमा से ज्यादा फैला सकें। 1999-2000 में यह सवाल निर्णायक महत्व का हो गया तो वाम मोर्चे ने पूंजीपतियों को बुलाकर औद्योगिक विकास की नीति अपनाई।
सार्वजनिक निवेश को ठुकराने का खमियाजा
अब यह इतिहास का हिस्सा है कि यह कैसे नीति बैकफायर कर गई? इसकी परिणति उस सामाजिक गठबंधन के उभरने के रूप में हुई जिसकी प्रतीक ममता बनर्जी बनीं और जिसने आखिरकार 34 साल पुराना लाल किला ध्वस्त कर दिया। मगर यह सवाल अपनी जगह कायम है कि आखिर पश्चिम बंगाल और प्रकारांतर में किसी अन्य राज्य या समाज का विकास होना चाहिए या नहीं? और अगर विकास होना है तो उसका रास्ता क्या है? कुछ जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि केरल की अच्युतानंदन सरकार ने .बंगाल से अलग नीति अपनाई। इस नीति के केंद्र में सामाजिक क्षेत्र में सरकारी निवेश बढ़ाना था, जिससे जन कल्याण के उद्देश्य भी आगे बढ़े और जिसका आर्थिक विकास दर में भी प्रभावशाली योगदान रहा। इसी के फलस्वरूप एलडीएफ सिर्फ मामूली अंतर से पिछड़ा।
विकास नीति से तय होगा भविष्य
ये दोनों अनुभव अब गम्भीर अध्ययन के विषय हैं क्योंकि अगर देश में संगठित लेफ्ट का कोई भविष्य है तो यह उसके द्वारा पेश की जाने वाली विकास नीति से ही तय होगा। भाकपा नेता एवीबर्धन ने कहा है कि लेफ्ट अब विशाल मध्य वर्ग को नजरअंदाज नहीं कर सकता, उसे इससे संवाद
करना होगा। अब तक लेफ्ट की नीति अपने मुख्य आधार वर्ग- खेतिहर एवं औद्योगिक मेहनतकश तबकों को केंद्र में रखकर राजनीति विकसित करने की रही है। इस संदर्भ में यही सवाल अहम है कि क्या लेफ्ट विकास की नीति और सुविचारित कार्यक्रम पेश करने में सक्षम है जिसमें मेहनतकश से लेकर मध्य वर्ग तक अपना हित देख सके?
अगले चरण का मॉडल भी रखना होगा
नेताओं की व्यक्तिगत ईमानदारी और विचारधारा आधारित राजनीतिक संस्कृति आज भी वामपंथी दलों की एक महत्वपूर्ण थाती है बल्कि अब यह एक अनोखी राजनीतिक पूंजी बन गई है। लेकिन उनकी समस्या यह है कि एक खास विकासक्रम के बाद विकास के अगले चरण का वे कोई अलग मॉडल पेश करने में नाकाम रहे हैं। एक मौके पर आकर उनके द्वारा कांग्रेस और भाजपा के मॉडल को स्वीकार कर लेने से उनके अपने समर्थक समूहों में सिर्फ भ्रम, बल्कि गुस्सा भी पैदा हुआ। प्रश्न यह है कि क्या माकपा और अन्य वामपंथी दलों के नेताओं में कुछ नया सोचने और विकास का नया मॉडल देश के सामने रखने की क्षमता और इच्छाशक्ति है? यह प्रश्न सिर्फ इन दलों बल्कि इस देश के व्यापक जनतांत्रिक समूहों के लिए भी आज लगभग निर्णायक महत्व का हो गया है, क्योंकि इसके बिना एक प्रासंगिक वाम के उदय की सम्भावना न्यूनतम है। यह मुमकिन है कि ममता बनर्जी के सम्भावित विफल शासन और केरल में सत्ता परिवर्तन के क्रम के तहत वाम दल पांच साल बाद फिर से सत्ता में जाएं लेकिन तब भी उन्हें वह प्रासंगिकता हासिल नहीं होगी जिससे वे देश में एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर सकें। आज सिर्फ वैकल्पिक राजनीतिक ताकतों की नहीं बल्कि देश के समग्र विकास की वैकल्पिक समझ और उसकी रूपरेखा की जरूरत है। अगर वाम मोर्चा इस जरूरत को पूरा कर सकता है, तो वह प्रासंगिक बना रहेगा वरना पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों ने उसे बीच भंवर में डाल दिया है।

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