देश में पश्चिम बंगाल सहित अन्य हिस्सों में मुख्यधारा की पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा पश्चिम बंगाल के चुनाव में माकपा और उसके सहयोगियों की हार को एक ऐसे निर्णायक मोड़ की तरह देख रहा है जो भारत में वामपंथ के लिए एक तरह से अंत की ओर संकेत कर रहा है। मीडिया के ये हिस्से इस हार के लिए नव-उदारवादी नीतियों और भारत-अमेरिकी सामरिक साझीदारी के खिलाफ वामपंथ के कठमुल्लावादी विरोध को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। स्वाभाविक रूप से मीडियाई सलाह इस ओर इशारा करती है कि अगर वामपंथ को प्रासंगिक बने रहना है तो उसे अपना कठमुल्लापन छोड़ना पड़ेगा और सत्तारूढ़ अभिजात्य वर्ग द्वारा चुने गए नीतिगत माहौल और राजनीतिक आर्थिक दिशा को चुनौती दिए बगैर वाम राजनीति को उस दिशा के अनुकूल बनाना होगा।
किसान हितों पर कुठाराघात का दुष्फल
इस विश्लेषण के साथ दिक्कत यह है कि पश्चिम बंगाल में वास्तव में घटित हुए का इससे कुछ भी लेना-देना नहीं है। सचाई तो यह है कि पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार ने सत्ताधारी कुलीनों के ज्ञान के मार्ग पर ही चलना शुरू कर दिया था। कुछ सालों पहले बुद्धदेव भट्टाचार्य कॉरपोरेट मीडिया के सबसे बड़े चहेते हुआ करते थे, बहुत कुछ उसी तर्ज पर जैसा कि अपनी राजनीतिक तरुणाई के दिनों में चंद्रबाबू नायडू हुआ करते थे, या वर्तमान समय में नरेंद्र मोदी और नवीन पटनायक हैं। कुछ मीडिया घरानों ने तो बेहद उत्साह में उन्हें भारत में ‘वामपंथी राजनीति का एक नया ब्रांड’ घोषित कर देने में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी और बड़े प्यार से उन्हें ‘ब्रांड बुद्धा’ कह कर बुलाते थे। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में माकपा की हार ‘एल-पी-जी’ (उदारीकरण, निजीकरण और वैीकरण) नीतियों का विरोध करते हुए नहीं हुई है, बल्कि उसने ग्रामीण गरीबों और कामगार किसानों के हितों व अधिकारों पर कुठाराघात करते हुए उन्हीं नीतियों को लागू करने की कीमत चुकाई है।
नए दौर के किसान विद्रोह का नतीजा
आइए जरा उन संदभरें व हालात पर गौर करें, जिन्होंने पश्चिम बंगाल की गद्दी से माकपा को बेदखल करने में अहम भूमिका निभाई है। यह सरकार किसी विरोधी केंद्र द्वारा नहीं गिराई गई है और न ही तख्तापलट की यह पटकथा किसी बड़ी कॉरपोरेट लॉबी द्वारा पश्चिम बंगाल में उनके प्रवेश निषेध, या लड़ाकू ट्रेड यूनियन के द्वारा राज्य से उन्हें बाहर करने की मुहिम के मद्देनजर लिखी गई है। माकपा को अपने सबसे अहम राज्य में पराभव की कीमत पार्टी द्वारा बहुप्रचारित भूमि सुधारों के रिकॉर्ड के खिलाफ किसी सामंती प्रतिक्रिया की वजह से भी नहीं चुकानी पड़ी है और न ही यह उपभोक्तावादी सपनों के पूरा न होने की वजह से नाराज ऊध्र्वगामी मध्यवर्ग की तरफ से हुआ विद्रोह है। इसके उलट यह मुख्यत: हमेशा से मौजूं रहे जमीन, रोजी-रोटी और लोकतंत्र के उन्हीं पुराने मुद्दों पर उभरे एक नए दौर का किसान विद्रोह है जिसने चुनावी जंग में माकपा के लिए इस बेहद अफसोसजनक हार की भूमिका तैयार की है।
कई भूलों ने लिखी हार की पटकथा
मीडिया तो अपनी कहानी दोहराता ही रहेगा, मगर माकपा की तरफ से आ रही प्रतिक्रिया भी टालमटोल व पलायनवादी दृष्टि का ही परिचय दे रही है। पांच साल पहले सिंगुर में जब से किसानों का विद्रोह शुरू हुआ, माकपा ने इसे यह कह कर खारिज कर दिया कि ‘अभियान औद्यौगिकीकरण के खिलाफ चलाया जा रहा है’ और विरोध में शामिल किसानों के राजनीतिक चरित्र पर सवाल खड़े किए गए। जब नंदीग्राम की घटना घटी तो माकपा ने इसे एक ऐसे वामपंथ विरोधी षड्यंत्र का नाम दे दिया जिसकी बागडोर धुर दक्षिणपंथी व अतिवादी वाम के साझा हाथों में थी। जब लालगढ़ पुलिसिया बर्बरताओं के खिलाफ विद्रोह कर उठा तो इससे निपटने के लिए माकपा ने केंद्र के साथ मिलकर एक साझा पैरामिलिट्री अभियान शुरू कर दिया। यह तो लोकसभा चुनावों में मिली हार है जिसने माकपा को यह स्वीकार करने पर मजबूर कर दिया कि बहुत कुछ गलत हो गया है।
प्रायश्चितबोध की कमी से बना पहाड़
मगर इन सबके बावजूद अपने द्वारा किए गए अत्याचार के लिए ईमानदारी से माफी मांगने की कोई पहल नहीं दिखी और न ही कामकाज की इस दिशा में बदलाव की कोई पहल ली गई। यही वजह रही कि नेतई में नंदीग्राम फिर से दोहराया गया, माकपा नेताओं की तरफ से दम्भपूर्ण दावे किए जाते रहे और कई नेताओं ने पूरे चुनाव के दौरान सामंती पितृसत्तात्मक मानसिकता का परिचय देते हुए यौन कुंठाग्रस्त भाषण देना जारी रखा। लोकसभा चुनाव में 11 लाख वोटों से हुई हार को महज सांख्यिकीय आंकड़ों तक सीमित करते हुए यह कहा गया कि वोटों की इस कमी की भरपाई आसानी से की जा सकती थी अगर हर बूथ से कुछ और वोट मिल जाते!
अब भी समझने की कोशिश नहीं
अब भी माकपा नेता ‘पार्टी को छोड़ बाहर गए लोगों’ को वापस लाने और ‘अलग-थलग’ पड़ चुके लोगों का भरोसा फिर से जीतने की बात कर रहे हैं। जाहिरा तौर पर इन बातों में राह से भटक जाने की उस प्रवृत्ति की शिनाख्त करने की कोई कोशिश नहीं है जिसे सभी ईमानदार वामपंथी कार्यकर्ता और शुभचिंतक शिद्दत से महसूस कर रहे हैं। पार्टी के भीतर इस असलियत को पहचानने का भी कोई प्रयास नहीं दिखता है कि आज वह जिस संकट से लड़ रही है, वह खुद कामगार जनता व प्रगतिशील लोकतांत्रिक बौद्धिक जगत के एक बड़े हिस्से से उसके अलगाव में निहित है। यह सिर्फ कुछ ‘मतभेद रखने वालों’ या ‘पार्टी छोड़ बाहर गए लोगों’ को ‘मैनेज’ करने की समस्या तक सीमित नहीं है।
माकपाइयों का कांग्रेसी ढर्रा
माकपा प्रचारकों द्वारा पश्चिम बंगाल में अपनी उपलब्धियां गिनाते हुए हमें बार-बार याद दिलाया जाता है कि किस तरह से उन्होंने वहां भूमि सुधार लागू किए या पंचायती राज की स्थापना की। लेकिन आज की तारीख में इससे शायद ही कोई प्रेरणा जग पाती है जब ग्रामीण गरीबों की तरफ से माकपा के ऊपर भूमि सुधार को उलटने, किसानों व फसल में हिस्सेदारों की बेदखली और काबिल व जरूरतमंद लोगों को व्यापक स्तर पर नियमित पंचायती फायदों से वंचित करने के सही आरोप लगाए जाते हैं। पूरा मसला बहुत कुछ उस कांग्रेस की तरह है जो ऐसे वक्त में आजादी लाने और संसदीय लोकतंत्र बहाल करने की बात कर रही है जब लोग हर क्षेत्र में अमेरिकी वर्चस्व का हावी होना और बर्बर कानूनों व सैन्य अभियानों के जरिये लोकतंत्र पर व्यवस्थागत हमले में लगातार होते इजाफे को महसूस कर रहे हैं!
विडम्बना यह है कि पश्चिम बंगाल के चुनावों ने न केवल माकपा की अवसरवादी और विासघातपूर्ण बेशर्म कारनामों की कीमत वसूल की है बल्कि इसने माओवादियों के राजनीतिक दिवालियेपन की भी पोल खोल कर रख दी है। नंदीग्राम में फूट पड़े किसान विद्रोह और लालगढ़ में सुलगते आदिवासी प्रतिरोध के दौर में माओवादियों को ‘जंगलमहल’ के नाम से जाने जाने वाले पश्चिम बंगाल के पश्चिमी क्षेत्र में स्थित जंगली इलाकों में राजनीति के लिए उर्वर जमीन दिखी। उफान भरते ज्वार के साथ उन्होंने भी अपना रुख मोड़ते हुए पश्चिम बंगाल की आगामी मुख्यमंत्री के बतौर ममता बनर्जी को अपना समर्थन दिया। नतीजतन पश्चिम बंगाल की मीडिया में उनके बारे में सनसनीखेज और कई बार सहानुभूति से लबरेज खबरें छपीं। लेकिन सच्चाई यह है कि उनकी रुचि केवल अपने तरीकों से किए जा रहे हथियारबंद कार्रवाइयों में दिखी। उन्होंने माकपा नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपना अंधाधुंध निशाना बनाया और बढ़ते राज्य दमन के खिलाफ संघर्ष में लगे लालगढ़ के सशक्त व लड़ाकू जनविद्रोह को राह से विचलित करने की भूमिका में उतर आए। जब छत्रधर महतो, जो लालगढ़ आंदोलन से उभरा मुख्य नाम था, ने झाड़ग्राम से विधानसभा चुनाव लड़ने का निर्णय लिया तो माओवादियों ने एक तरह से उनसे पल्ला झाड़ लिया और उनमें से कई लोगों ने इसे एक ‘विचलन’ करार देते हुए कहा कि उनका यह कदम माकपा की मदद करेगा और तृणमूल कांग्रेस की सम्भावनाओं को क्षति पहुंचाएगा! खैर, अंतत: तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी की जीत हुई और उल्लेखनीय 20,000 वोट हासिल कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए छत्रधर महतो तीसरे स्थान पर रहे।
दक्षिणपंथ के प्रति सतर्कता की जरूरत
बहरहाल, ममता बनर्जी के नेतृत्व में सत्ता प्रतिष्ठान ने काम करना शुरू कर दिया है। आज वहां सर्वत्र उत्साह है। शायद बदलाव और संक्रमण के मौजूदा वक्त में इस तरह के उत्साह को सहज ही समझा जा सकता है और निस्संदेह इसमें एक स्वत:स्फूर्तता का भाव भी छिपा है, लेकिन साथ ही दक्षिणपंथ द्वारा इस उत्साह का बेहद सचेत इस्तेमाल कर ले जाने की कोशिश भी साफ तौर पर देखी जा सकती है जिससे सभी धाराओं की वामपंथी राजनीति और विचारधारा को ध्वस्त करने के लिए तमाम किस्म के हमलों का पक्का लाइसेंस मिल जाए। एक आक्रामक दक्षिणपंथ की ओर झुकाव व बदलाव निश्चय ही पश्चिम बंगाल के नतीजों में निहित उत्साहपूर्ण भावना के उलट जाएगा। ऐसे में क्रांतिकारी कम्युनिस्टों को लोकप्रिय जनतांत्रिक आकांक्षाओं का केंद्र बनते हुए बहादुराना ढंग से दक्षिणपंथी ताकतों के एजेंडे का पर्दाफाश करना होगा और हर मोड़ पर नए सत्ता प्रतिष्ठान की जनविरोधी कार्रवाइयों का तीखा प्रतिरोध करना होगा। आने वाले वक्त में यह देखना व समझना बेहद दिलचस्प होगा कि कैसे माकपा अपनी ‘राजनीतिक पुनखरेज’ करती है और जनांदोलनों के रास्ते पर अग्रसर होती है। जहां तक संघषर्शील कम्युनिस्ट कतारों की बात है, पश्चिम बंगाल और राष्ट्रीय स्तर पर उनके लिए अनेक चुनौतियां और सम्भावनाएं दोनों ही मौजूद हैं। ‘सरकार/सत्ता केंद्रित वाम एकता’ के माकपाई मॉडल के इस विध्वंस के बाद आने वाला समय संघषर्शील क्रांतिकारी कम्युनिस्ट कतारों से एकजुट होने की मांग कर रहा है। (भाकपा महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य से अभिरंजन की बातचीत पर आधारित)
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