Tuesday, June 14, 2011

शिकस्त जनवाद का गला घोंटने का बदला है यह करारी


यदि पश्चिम बंगाल की जनता ने वाम फ्रंट को 34 वर्षों तक सत्ता पर विराजमान रहने दिया था तो आखिर क्या बात है कि उसने इन्हें 8वीं बार विधानसभा चुनाव में धक्का मारकर सत्ता से बाहर कर दिया? कामरेड प्रकाश करात आज भले ही अपनी बुरी हार को केवल एक चुनावी पराजय कहें, यह साफ है कि जनता ने उन्हें कठोर सजा सुनाने का मन बना लिया था। इसलिए 34 वर्षों में वाम सरकार ने क्या किया था, उसे याद करने की जगह अब चर्चा है कि राज्य की जनता को शुरुआती दिनों में जो कुछ सकारात्मक कदम दिखा था, वह दु:स्वप्न में कैसे बदल गया? यह स्पष्ट है कि सत्ताच्युत होने से काफी पहले वाम फ्रंट ने अपना कम्युनिस्ट चरित्र खो दिया था। यानी इनकी जो सबसे बड़ी उपलब्धि गिनाई जाती रही-भूमि सुधार-ऑपरेशन बर्गा भूमि वितरण और गरीब मजदूरों के जीवन की बेहतरी- सभी आधे रास्तेडी-रेलहुए।
वर्ग-समझौते की लाइन से हुआ मोहभंग
यह सचाई 2002 में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री सूर्यकांत मिश्र ने अपने एक आलेख में इस तरह स्वीकार की थीकि ऑपरेशन बर्गा द्वारा भूमिहीनों को भूमि वितरण के जरिये एक हिस्से को फायदा हुआ था पर राज्य के ग्रामीण इलाकों में विषमता का अंत करने में यह कामयाब नहीं रहा।’ 17 प्रतिशत बर्गादार अपना हक खो बैठे और 27 प्रतिशत पर खतरा मंडरा रहा था। 1946 से 1978 तक जो हासिल हुआ था वह सत्ता की भूख की बलि चढ़ गया। बाद में 40,000 एकड़ से अधिक जमीन को बड़े उद्योगों रीयल एस्टेट योजनाओं विशेष आर्थिक क्षेत्रों के लिए अधिग्रहण किया गया। अंतराष्ट्रीय जगत मेंसोशल डेमोक्रेटया सामाजिक जनवादी वे होते हैं जो व्यवस्था के साथ समझौता करके चलते हैं चुनावी सफलताओं के जरिये सत्ता की ओर बढ़ते हैं। यह सच है कि सीपीएम ने किसानों मजदूरों के संघर्ष और युवाओं के क्रांतिकारी उभार के जरिये सत्ता हासिल की थी पर वे शुरू से ही वर्ग-समझौते की लाइन पर चले। इन्हें हम सोशल डेमोक्रेट्स के भारतीय संस्करण कह सकते हैं। शायद लोग भी देर-सबेर समझ गए कि इनसे व्यवस्था परिवर्तन का लक्ष्य कभी पूरा नहीं होगा।
जनवादी मूल्यों को तिलांजलि का सिला
जनता की जनवादी क्रांति को सफल वे कैसे बना सकते थे जो खुद जनवादी मूल्यों को तिलांजलि दे रहे थे? जनवाद का गला घोंटकर निरंकुशता कायम की गई। जो आवाज़ उठती उसे कुचल दिया जाता- पार्टी के बाहर या भीतर। 1967 में अजय मुखर्जी की सरकार में जब सत्ता का थोड़ा स्वाद मिला तो मानों शेर के मुंह में खून लग गया, ज्योति बसु के गृहमंत्रित्वकाल में नक्सलबाड़ी के किसान संघर्ष को रौंदा गया। हजारों मरे। 40 वर्ष बाद यही इतिहास नंदीग्राम में दोहराया गया। 1997 में सरकार की घोषणा थी कि श्रमिकों को हड़ताल करने का हक नहीं। 2007 में जब सिंगुर के गरीब किसानों के लिए बंगाल के बुद्धिजीवियों ने गुहार लगाई-महाेता देवी, मेधा पाटकर, अपर्णा सेन जैसे लोग सड़कों पर उतरे-तो सरकार नेदमदमी दवाईकी धमकी दी। यह रास्ता था जनता की जनवादी क्रांति का?
माफिया-गुंडा राज से बदला जन-मन
सुशासन कौन दे सकता है? वह सरकार जो हमेशा अपनी कमजोरियों को छिपाने के लिए केंद्र सरकार के सिर पर ठीकरा फोड़कर बच निकले? आखिर क्या बात है कि सामाजिक संकेतकों का जहां मामला है, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और यहां तक कि भाजपा शासित गुजरात तक आगे निकल गए। सिंगुर में यदि 37 प्रतिशत पंजीकृत बर्गादार हैं तो 170 का पंजीकरण नहीं हैं। स्कूल ड्रापआउट रेट 5.7 प्रतिशत से नीचे नहीं उतरा। 2007 में जन वितरण पण्राली का ऐसा भट्ठा बैठ गया था कि खाद्य के लिए राज्य में दंगे हुए। जिस राज्य में ग्रामीणों परिवारों के 10.5 प्रतिशत को पर्याप्त भोजन नहीं मिलता हो, उसके बारे में क्या कहें? पिछले एक दशक में राज्य में कोई प्राथमिक चिकित्सा केंद्र नहीं खुला और अस्पतालों में प्रति 1,000 जनसंख्या केवल 1.6 बेड थे जबकि वि स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 3 होना चाहिए।
सरकार ने केवल 9 मेडिकल कॉलेज स्थापित किए। शिक्षा के क्ष़ेत्र में भी पश्चिम बंगाल 32वें स्थान पर रहा। रोजगार की स्थिति दयनीय रही- आईटीआई स्थापित करने के मामले में राज्य सरकार उत्तर प्रदेश से भी पीछे रही। 2000-2005 के बीच महिलाओं पर अपराध 69 प्रतिशत बढ़ा। कृषि विकास की दर भी 2001-2007 तक मात्र 7.8 प्रतिशत तक पहुंची और उद्योग बीमार पड़ते गए। अल्पसंख्यकों की स्थिति यह रही कि 2 प्रतिशत बच्चों को शिक्षा मिलती और गरीबों के लिए फंड का 6 प्रतिशत खर्च होता। और आदिवासियों पर वाममोर्चा सरकार का रुख लालगढ़ की घटनाओं से स्पष्ट है। जहां दूसरे नम्बर पर सबसे अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे जीते हों, क्या उस राज्य के नेता बता सकते हैं कि वे केवल केंद्र पर इसका दोष मढ़कर अपनी जिम्मेदारी से बच जाएंगे? इस राज्य में पंचायती राज्य कुख्यात कैडर राज्य में बदल गया और फिर वह माफिया-गुंडा राज्य बन गया था।
जनता ने नहीं, नेताओं ने तोड़ा वाम से नाता
सच कहें तो वाम विचारधारा से जनता का मोहभंग नहीं हुआ बल्कि इससे पहले ही नेताओं ने वाम से अपना नाता भंग कर लिया। बसु के दौर में लोग महसूस कर रहे थे कि वामपंथ कोडाइल्यूटकिया जा रहा है परबुद्धा बाबूने तो अपने को पूंजीवाद का दुलारा ही बना लिया। इसलिए वामपंथी सरकार ध्वस्त हुई तो कुछ लोगों को कहने का मौका मिल गया कि यह वामपंथ का खात्मा है, जो कि गलत है। इन्होंने अन्य राज्यों, खासकर पड़ोसी राज्य उड़ीसा और बिहार-झारखंड में विस्तार करने का काम नहीं किया क्योंकि केंद्र सरकार को बताना था कि वाम उनके लिए कोई चुनौती पेश नहीं करेगा, ही बुजरुआ विचारधारा को उनसे कोई खतरा है। ये लग गए अपने आप को जिम्मेदार सरकार और केंद्र में जिम्मेदार विपक्ष साबित करने में। जनता के हितों से अधिक पूंजीपतियों और ग्रामीण धनिकों के प्रति जवाबदेह बनने लगे। ऐसे में वाम विचारधारा को कैसे आगे बढ़ाया जा सकता था?
नासमझी ने पैदा की सड़ांध
जिस राज्य को हम जनवादी और क्रांतिकारी संघर्षं के अगुआ के रूप में देख रहे थे वह गतिरोध और सड़ांध का शिकार बना; सरकारी नौकरशाही और कैडर राज ने लोकतंत्र को कुचलने का काम किया। जब लोगों के सिर के ऊपर से पानी गुजरने लगा तो उन्होंने बदला लिया। स्वतंत्र चिंतन और नए विचारों का गला घोंटा गया। तभी जनता को विद्रोह करना पड़ा। स्वंतत्र बुद्धिजीवियों को खतरा समझा गया और पार्टी के भीतर भी अर्थशास्त्री अशोक मित्रा इतिहासकार सुमित सरकार को दुश्मन माना गया। क्या वाम विचारधारा को ऐसे आगे बढ़ाया जा सकता था? हम तो कहेंगे कि ये बुजरुआ व्यवस्था के अंग बन गए। इनका चार दशकों का इतिहास है एकमॉडरेटवामपंथी सामाजिक जनवाद से धुर जन-विरोधी दक्षिणपंथी सामाजिक जनवाद में तब्दीली का। इनका जनता से इस कदर अलगाव हो गया था कि सरकार ढह गई तो लोग जश्न मनाने लगे! क्या अपने राज्य में ये गरीबों, किसानों-मजदूरों के पक्ष में नीति निर्माण नहीं कर सकते थे? क्या साम्प्रदायिक हिंसा और महिला उत्पीड़न को खत्म करने के लिए सख्त कानून बनाना सम्भव था ? क्या भूमि सुधार के एजेंडे को मझधार में डुबा देना और पंचायती राज कायम कर लूट को संस्थागत करना इनकी मजबूरी थी? ऐसामॉडलबुजरुआ सरकार के मॉडल को चुनौती क्या देता, वह उसकी समस्त बीमारियों से ग्रस्त था। (लेखिका अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन  की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं

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