पांच राज्यों के चुनावी नतीजे भारतीय राजनीति के दृष्टिकोण से बेहद अहम साबित हुए। जिस पश्चिम बंगाल के बूते वामपंथी दल केंद्र में तीसरी शक्ति की बात जोर-शोर से करते रहे थे, वही मजबूत किला उनके हाथ से निकल गया। ऐसे में पार्टियां क्यों हारी, इसे आंकने की जरूरत है। दरअसल, बंगाल में धीरे-धीरे यह हुआ कि सत्ता तंत्र का राजनीतिकरण हुआ, जिसमें पार्टियों का अलग से अस्तित्व नहीं रहा। उनका सत्ता में लोप हो गया। इससे हुआ यह है कि आम आदमी पार्टियों से दूर होता गया और पार्टियां सत्ता में ही सिमटती गईं। आम आदमी खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगा था और उसने फिर से सत्ता पर काबिज होने की कोशिश शुरू की। दोतीन बार अलग-अलग चुनावों में कोशिश करने के बाद विधानसभा चुनाव में उसने वामपंथी पार्टी को सत्ता से बाहर फेंक कर खुद ही उस पर कब्जा जमा लिया। इस नतीजे से यह तो साफ हो गया है कि वामपंथ जिस विचारधारा और कार्यपद्धति के साथ इस देश में काम कर रहा था, उसकी प्रासंगिकता अब खत्म हो चुकी है। पार्टी को अपनी विचारधारा और कार्यपद्धति में निश्चित तौर पर बदलाव लाना होगा। पार्टियों को खुद को रूपांतरित करना होगा। हालांकि मुझे इसकी कोई आशा नहीं दिख रही है क्योंकि खुद को रूपांतरित करने कि लिए जिस साहस और विजन की जरूरत होती है, उसका नितांत अभाव है। लीडरशिप का अभाव वामदलों खासकर माकपा में
लीडरशिप का अभाव
दिख रहा है। केंद्र में कमान प्रकाश करात के पास है जबकि बंगाल में पार्टी बुद्धदेव भट्टाचार्य और विमान बोस जैसे नेताओं के
भरोसे चुनाव में उतरी थी। बुद्धदेव और विमान बोस बदले हुए तकाजों को बंगाल में भांप नहीं पाए। वह नई पीढ़ी के साथ तालमेल नहीं बिठा पाए। उनकी मुश्किलों और आकांक्षाओं के मुताबिक चल नहीं पाए। लिहाजा लोगों ने नए नेताओं पर भरोसा किया। दूसरी ओर प्रकाश करात अपनी पार्टी को अब तक अखिल भारतीय स्तर पर यथार्थवादी नहीं बना पाए। पार्टी के प्रति उनकी सोच-समझ का नजरिया ऐसा है कि उन्होंने बुद्धदेव भट्टाचार्य पर भरोसा किया जिसे बंगाल की जनता ने स्वीकार नहीं किया। दूसरी ओर अच्युतानंदन पर पार्टी भरोसा नहीं कर रही थी लेकिन केरल की जनता ने उन पर भरोसा नहीं खोया था।
वैचारिक कठमुल्लापन
लेकिन वामपंथी दलों के साथ सबसे बड़ी मुश्किल यह भी है कि अब उनके पास ज्योति बसु जैसे कद का दूसरा नेता भी नहीं रहा। हालांकि बाद के सालों में उनकी सरकार ने भी बहुत कुछ खास नहीं किया लेकिन बसु हमेशा आम लोगों को उनकी मुश्किलों से निजात दिलाने का
आासन देने में कामयाब होते थे। लेकिन मेरे ख्याल से माकपा की जो गत अभी हुई है, उसमें उनकी भी भूमिका थी। उन्होंने एक ओर तो सत्ता का स्थानीयकरण पर जोर दिया तो दूसरी तरफ माकपा में संगठन की तानाशाही को विकसित होने दिया। संगठन की तानाशाही मेरे ख्याल से एक व्यक्तिकी तानाशाही के मुकाबले ज्यादा निर्मम होती है। माकपा इसी तानाशाही के नशे में ही हाशिए पर गई है। उससे एक ऐतिहासिक चूक पहले ही हो चुकी है, बसु के प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव एक सिरे से खारिज कर। वह मौका था जब पार्टी अपने भारतीय संदर्भ में अपनी छवि को विस्तार दे सकती थी लेकिन वैचारिक कठमुल्लेपन की वजह से उस मौके को गंवा दिया।
सत्ता में लोप हुआ पार्टी का अस्तित्व
वामपंथ की जिस तरह से हार हुई है, उससे वामपंथी राजनीति के भविष्य पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। मौजूदा समय में जिस तरह बाजार की शक्तियों का दबाव बढ़ रहा है, हर ओर साम्राज्यवादी ताकतें बढ़ रही हैं और भारत में गरीबी और बेरोजगारी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है, वैसी हालत में वामपंथ की प्रासंगिकता तो बनी रहेगी। आर्थिक उदारीकरण के दौर में जब सब कुछ बाजार से संचालित होने लगेगा तो वामपंथी राजनीति की प्रासंगिकता और ज्यादा बढ़ेगी। लिहाजा यह माकपा के लिए अहम समय है। उन्हें मुख्यधारा में वापस आने के लिए साहस दिखाना होगा। बदलाव को समाहित करना होगा और खुद को जनता से जोड़ना होगा। नेता-धनबली-नौकरशाह के गठजोड़ वाले इस दौर में लाचार-बेबस आम जनता के लिए राजनीति की गुंजाइश है। इसके लिए कोई न कोई सशक्त राजनीतिक व्यवस्था भी बनेगी। वामपंथी दलों के पास यह व्यवस्था बनाने का मौका है, लेकिन उन्हें अपने मौजूदा चरित्र में बदलाव लाने होंगे। हमें समझना होगा कि भारत में वामपंथी राजनीति अब भी हाशिए पर नहीं गई है, हमारे वामपंथी राजनीतिक दल आम लोगों से दूर होने की वजह से हाशिए पर आ गए हैं।(केएन गोविंदाचार्य से प्रदीप कुमार की बातचीत पर आधारित)
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