पश्चिम बंगाल और केरल में अपनी तगड़ी पराजय के बाद लगता है कि सीपीएम (माकपा) ने एक सबक सीखा है। सीपीएम पोलित ब्यूरो के वरिष्ठ सदस्य सीताराम येचुरी के व्यापक वाम एकता के प्रस्ताव को इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए। हालांकि, येचुरी के इस बयान को सीपीआइ (भाकपा) अभी संदेह की दृष्टि से देख रही है। आखिर 50 साल के इतिहास में सीपीएम की तरफ से पहली बार आए वाम एकजुटता के इस प्रस्ताव पर सीपीआइ झटके में यकीन भी कैसे करे? सीपीआइ की तरफ से पहले हुए कई एकजुटता के प्रयासों को सीपीएम ने न सिर्फ खारिज कर दिया था, बल्कि खूब मखौल भी उड़ाती रही। सीपीआइ और राजनीतिक विश्लेषक येचुरी के बयान की मीमांसा करने में जुटे हैं। कहीं यह सीपीएम का पराजय के दंश को कम करने का प्रयास भर तो नहीं है या फिर वास्तव में इसके निहितार्थ तात्कालिक परिस्थितियों से आगे जाकर व्यापक वाम एकता का संकेत कर रहे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण बात यह भी है कि 1964 में संयुक्त साम्यवादी दल से निकल कर सीपीएम ने ही अलग खूंटा गाड़ा था। इस टूट के बाद सीपीआई ट्रेड यूनियनों से बाहर निकलकर जमीनी लड़ाई लड़ने में अक्षम रही। वहीं, सीपीएम ने सांगठनिक ढांचे और जुझारुपन से भारत में साम्यवाद आंदोलन का परचम खुद थाम लिया। पश्चिम बंगाल में सिद्धार्थ शंकर रे के दमन चक्र से लोहा लेने वाली भी सीपीएम ही थी। संभवत: इसीलिए, उसे यह अहंकार भी रहा कि भारत के साम्यवादी आंदोलन पर उसका एकाधिकार है। सीपीएम के नेता अक्सर सीपीआइ को कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंदिरा कहकर कटाक्ष करते थे। कुछ समय पहले तक सीपीएम का यही मानना रहा है कि सीपीआइ साम्यवाद के आवरण के नीचे छुपे सुविधावादियों, समझौतावादियों और सरकारपरस्त बुद्धिजीवियों का एक संगठन है। सीपीआइ का इतिहास इस धारणा को पुष्ट भी करता रहा है। भारत और सोवियत संघ में संबंधों का सबसे ज्यादा लाभ उसने ही उठाया और सौदेबाजी कर अपनी ट्रेड यूनियन की राजनीति भी खूब चमकाई। दूसरी ओर सीपीएम ने सिद्धांतों पर समझौता न करने की छवि बनाई। यहां तक कि उसने अपने वरिष्ठतम नेता ज्योति बसु के प्रधानमंत्री बनने के खिलाफ वीटो लगा दिया। यूपीए-एक को समर्थन देने के बावजूद सीपीएम कभी सत्ता के साथ समझौता करती नजर नहीं आई। अपने संघर्षशील इतिहास के कारण माकपा में एक वैचारिक दृढ़ता दिखती है। उसके विरोधी भी उसकी इस उपलब्धि की उपेक्षा नहीं कर सकते। ऐसे में हैदराबाद में माकपा की केंद्रीय समिति की बैठक के बाद दिए गए येचुरी के इस प्रस्ताव के पीछे सीपीएम की मंशा के निहितार्थ सीपीआइ व अन्य राजनीतिक विश्लेषक तलाश रहे हैं। सीपीएम का जैसा ढांचा है, उसमें यह प्रस्ताव येचुरी ने बिना चर्चा के दिया हो, यह मुमकिन नहीं लगता। फिर भी पूरी पार्टी के नेता इस प्रस्ताव पर कितना प्रतिपद्ध हैं, यह वक्त बताएगा। इस बात को भी नहीं नकारा जा रहा है कि सीपीएम ने यह अनौपचारिक पहल केवल तात्कालिक हार से पार्टी के भीतर चल रही उथल-पुथल को थामने के लिए की हो। अगर ऐसा है तो इसे किसी दीर्घकालिक दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। संभावना इस बात की भी ज्यादा है कि सीपीएम के मूल चरित्र में कोई बहुत परिवर्तन नहीं आया हो। दरअसल, सीपीएम की यह सोच रही है कि सीपीआइ कमजोर होकर समाप्त हो जाएगी और उसका एक बड़ा भाग सीपीएम के साथ स्वयं ही आ जाएगा। उस स्थिति में सीपीएम के लिए किसी शर्त को स्वीकार करने की मजबूरी नहीं होगी। यह समय बताएगा कि वैचारिक शुचिता और संागठनिक दृढ़ता की जिस बुनियाद पर सीपीएम ने अपने को अलग किया था, उसमें येचुरी का प्रस्ताव केवल रणनीतिक चाल है या फिर व्यापक वाम एकता का ईमानदाराना प्रयास!
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Wednesday, June 15, 2011
Tuesday, June 14, 2011
वाम के आत्मावलोकन का समय
पांच राज्यों के चुनावी नतीजे भारतीय राजनीति के दृष्टिकोण से बेहद अहम साबित हुए। जिस पश्चिम बंगाल के बूते वामपंथी दल केंद्र में तीसरी शक्ति की बात जोर-शोर से करते रहे थे, वही मजबूत किला उनके हाथ से निकल गया। ऐसे में पार्टियां क्यों हारी, इसे आंकने की जरूरत है। दरअसल, बंगाल में धीरे-धीरे यह हुआ कि सत्ता तंत्र का राजनीतिकरण हुआ, जिसमें पार्टियों का अलग से अस्तित्व नहीं रहा। उनका सत्ता में लोप हो गया। इससे हुआ यह है कि आम आदमी पार्टियों से दूर होता गया और पार्टियां सत्ता में ही सिमटती गईं। आम आदमी खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगा था और उसने फिर से सत्ता पर काबिज होने की कोशिश शुरू की। दोतीन बार अलग-अलग चुनावों में कोशिश करने के बाद विधानसभा चुनाव में उसने वामपंथी पार्टी को सत्ता से बाहर फेंक कर खुद ही उस पर कब्जा जमा लिया। इस नतीजे से यह तो साफ हो गया है कि वामपंथ जिस विचारधारा और कार्यपद्धति के साथ इस देश में काम कर रहा था, उसकी प्रासंगिकता अब खत्म हो चुकी है। पार्टी को अपनी विचारधारा और कार्यपद्धति में निश्चित तौर पर बदलाव लाना होगा। पार्टियों को खुद को रूपांतरित करना होगा। हालांकि मुझे इसकी कोई आशा नहीं दिख रही है क्योंकि खुद को रूपांतरित करने कि लिए जिस साहस और विजन की जरूरत होती है, उसका नितांत अभाव है। लीडरशिप का अभाव वामदलों खासकर माकपा में
लीडरशिप का अभाव
दिख रहा है। केंद्र में कमान प्रकाश करात के पास है जबकि बंगाल में पार्टी बुद्धदेव भट्टाचार्य और विमान बोस जैसे नेताओं के
भरोसे चुनाव में उतरी थी। बुद्धदेव और विमान बोस बदले हुए तकाजों को बंगाल में भांप नहीं पाए। वह नई पीढ़ी के साथ तालमेल नहीं बिठा पाए। उनकी मुश्किलों और आकांक्षाओं के मुताबिक चल नहीं पाए। लिहाजा लोगों ने नए नेताओं पर भरोसा किया। दूसरी ओर प्रकाश करात अपनी पार्टी को अब तक अखिल भारतीय स्तर पर यथार्थवादी नहीं बना पाए। पार्टी के प्रति उनकी सोच-समझ का नजरिया ऐसा है कि उन्होंने बुद्धदेव भट्टाचार्य पर भरोसा किया जिसे बंगाल की जनता ने स्वीकार नहीं किया। दूसरी ओर अच्युतानंदन पर पार्टी भरोसा नहीं कर रही थी लेकिन केरल की जनता ने उन पर भरोसा नहीं खोया था।
वैचारिक कठमुल्लापन
लेकिन वामपंथी दलों के साथ सबसे बड़ी मुश्किल यह भी है कि अब उनके पास ज्योति बसु जैसे कद का दूसरा नेता भी नहीं रहा। हालांकि बाद के सालों में उनकी सरकार ने भी बहुत कुछ खास नहीं किया लेकिन बसु हमेशा आम लोगों को उनकी मुश्किलों से निजात दिलाने का
आासन देने में कामयाब होते थे। लेकिन मेरे ख्याल से माकपा की जो गत अभी हुई है, उसमें उनकी भी भूमिका थी। उन्होंने एक ओर तो सत्ता का स्थानीयकरण पर जोर दिया तो दूसरी तरफ माकपा में संगठन की तानाशाही को विकसित होने दिया। संगठन की तानाशाही मेरे ख्याल से एक व्यक्तिकी तानाशाही के मुकाबले ज्यादा निर्मम होती है। माकपा इसी तानाशाही के नशे में ही हाशिए पर गई है। उससे एक ऐतिहासिक चूक पहले ही हो चुकी है, बसु के प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव एक सिरे से खारिज कर। वह मौका था जब पार्टी अपने भारतीय संदर्भ में अपनी छवि को विस्तार दे सकती थी लेकिन वैचारिक कठमुल्लेपन की वजह से उस मौके को गंवा दिया।
सत्ता में लोप हुआ पार्टी का अस्तित्व
वामपंथ की जिस तरह से हार हुई है, उससे वामपंथी राजनीति के भविष्य पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। मौजूदा समय में जिस तरह बाजार की शक्तियों का दबाव बढ़ रहा है, हर ओर साम्राज्यवादी ताकतें बढ़ रही हैं और भारत में गरीबी और बेरोजगारी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है, वैसी हालत में वामपंथ की प्रासंगिकता तो बनी रहेगी। आर्थिक उदारीकरण के दौर में जब सब कुछ बाजार से संचालित होने लगेगा तो वामपंथी राजनीति की प्रासंगिकता और ज्यादा बढ़ेगी। लिहाजा यह माकपा के लिए अहम समय है। उन्हें मुख्यधारा में वापस आने के लिए साहस दिखाना होगा। बदलाव को समाहित करना होगा और खुद को जनता से जोड़ना होगा। नेता-धनबली-नौकरशाह के गठजोड़ वाले इस दौर में लाचार-बेबस आम जनता के लिए राजनीति की गुंजाइश है। इसके लिए कोई न कोई सशक्त राजनीतिक व्यवस्था भी बनेगी। वामपंथी दलों के पास यह व्यवस्था बनाने का मौका है, लेकिन उन्हें अपने मौजूदा चरित्र में बदलाव लाने होंगे। हमें समझना होगा कि भारत में वामपंथी राजनीति अब भी हाशिए पर नहीं गई है, हमारे वामपंथी राजनीतिक दल आम लोगों से दूर होने की वजह से हाशिए पर आ गए हैं।(केएन गोविंदाचार्य से प्रदीप कुमार की बातचीत पर आधारित)
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