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Wednesday, June 29, 2011

वामपंथी एकता


वामपंथी एकता की बात लंबे अरसे से कही जा रही है। सोवियत संघ का पराभव होने और चीनी गणतंत्र द्वारा दाई ओर मुड़ जाने के बाद भारत के दोनों प्रमुख दलों सीपीएम और सीपीएम के अलग रहने का कोई औचित्य नहीं रहा। 1964 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के विभाजन का आधार सैद्वांतिक नहीं था। दोनों धड़ों में से किसी ने भी वाम की कोई नई व्याख्या पेश नहीं की थी। मुद्दा यह था कि आप सोवियत संघ के पिछलग्गू हैं या चीन के। जब सोवियत संघ ही नहीं रहा तब सीपीआइ के लिए कोई काम ही नहीं बचा। दूसरी ओर सीपीएम का चीन से मोहभंग बढ़ता गया है। इसलिए दोनों पार्टियों के मतभेद खत्म हो चुके हैं। फिर भी दोनों के विलय की स्थिति नहीं बन पाई है तो इसीलिए कि कहीं जमींदार और किसान का विलय होता है। यही वजह है कि सीपीएम ने सीपीआइ को पश्चिम बंगाल और केरल के वाम मोर्चा में शामिल तो कर लिया पर उसे विलय के लिए आमंत्रित करने का विचार उसके मन में कभी आया ही नहीं। पश्चिम बंगाल में सीपीएम की हार उसके लिए लोमहर्षक घटना थी। जो पार्टी अपने को अजेय मानने की आदत का शिकार हो गई थी उसे अचानक जमीन सूंघनी पड़ी। शोक के इसी माहौल में सीपीएम के एक बड़े नेता ने अपने भाषण में इस आशय का संकेत दे दिया कि आज वामपंथी एकता की जरूरत है। यह वास्तव में पतंग उड़ाना भी नहीं था, क्योंकि इस विषय पर पार्टी के किसी मंच पर चर्चा तक नहीं हुई थी। यह संकेत उस नेता का स्फुट विचार था जो उसके भाषण में पता नहीं कहां से रेंगते हुए आ गया था। यह बात भी रही होगी कि पराजय के बाद कुछ अच्छी बातें कहनी चाहिए ताकि श्रोता समझें कि वक्ता वामपंथ के भविष्य के बारे में वाकई चिंतित है। राजनीति में ही नहीं जीवन के किसी भी क्षेत्र में झूठी उम्मीद पैदा करना अच्छा नहीं होता। इस संकेत से सीपीआइ को अचानक लगने लगा कि उसके दरवाजे पर भविष्य ने दस्तक दी है। तत्काल उसके नेताओं ने वामपंथी एकता के विचार का स्वागत करते हुए ऐसे बयान देना शुरू कर दिया जिससे साबित होता है कि भारत की राजनीति में परिपक्वता खोज पाना जासूसों के लिए ही संभव है। दो दलों की एकता खासकर वाम दलों की एकता इतनी साधारण या आसान चीज नहीं है कि उसे मीडिया के माध्यम से संपन्न किया जा सके। वामपंथी एकता कोई आर्यसमाजी विवाह नहीं है कि सुबह सोचा और शाम को निपट गया। जाहिर है सीपीआइ बरसों से, बल्कि दशकों से इसी क्षण का इंतजार कर रही थी। बच्चन के शब्दों में खड़ा रहा इसीलिए कि तुम मुझे पुकार लो, लेकिन उसका स्वप्नभंग होने में हफ्ता भर भी नहीं लगा। सीपीएम की ओर से सफाई आ गई कि हमारे मन में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है। दरअसल, वामपंथी एकता का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है। राजनीति में एकता के पीछे दो इरादे होते हैं। एक इरादा होता है दांतकाटी रोटी का रिश्ता बनाने का। अकेले कुछ करना मुश्किल हो रहा है इसलिए हम दोनों साथ हो जाएंगे तो महाभोज का प्रबंध हो सकता है। इसी लालच में बसपा ने उत्तर प्रदेश में पहले समाजवादी पार्टी, फिर भारतीय जनता पार्टी से हाथ मिलाया। चूंकि स्वार्थ की एकता अधिक समय तक टिकती नहीं है, इसलिए दोनों ही गठबंधन नापाएदार निकले और जितनी तेजी से बने थे, उतनी ही जल्द भहरा भी गए। सीपीएम और सीपीआइ के विलय से सत्ता की संभावना बढ़ रही होती तो वामपंथी एकता का विचार निश्चय ही आकर्षक होता। चूंकि ये दोनों पार्टियां एक-दूसरे का वोट काटती नहीं हैं और सीपीआइ एक बुझता हुआ चिराग है इसलिए उसका विलय स्वीकार कर सीपीएम को क्या मिलने वाला है? राजनीतिक एकता या विलय के पीछे दूसरा इरादा किसी सिद्धांत या विचारधारा को मजबूत करना और उसे जनता के बीच ले जाने की रचनात्मक बेचैनी होती है। इस संदर्भ में 1977 में चार दलों की एकता को याद किया जा सकता है। इमरजेंसी के कटु अनुभव के बाद चारों दलों का विलय इसीलिए संभव हुआ कि देश में जागरूकता और आशा-आकांक्षा का एक नया वातावरण बना था जिसे बनाए रखने के लिए एक नई तरह की राजनीति की जरूरत थी। पर यह प्रयोग दो वर्ष भी नहीं चल सका, क्योंकि इस नई राजनीति की कोई शक्ल नहीं उभर सकी। जब सिद्धांत और नीति का कोई दबाव न रह जाए तो आदमियों की तरह दलों की भी क्षुद्रताएं प्रगट होने लगती हैं। इन क्षुद्रताओं का भार जनता पार्टी नहीं संभाल सकी और उसने इतिहास के कूड़ेदान में छलांग मार दी। क्या वामपंथी एकता का हश्र कुछ ऐसा ही नहीं होगा? नाम को छोड़ दिया जाए तो सीपीएम और सीपीआइ में से किसे वामपंथी पार्टी कहा जा सकता है। नाम की तरह वचन को भी छोडि़ए तो इनके कर्म में किस वामपंथ के दर्शन होते हैं। यदि प. बंगाल में सीपीएम ने वामपंथ को जीवित रखा होता तो वह न केवल उस राज्य का नवनिर्माण करने में सफल होती बल्कि देश के दूसरे हिस्सों में भी अपने पांव जमा सकती थी। सीपीआइ के बोल ज्यादा सुहावने होते हैं, क्योंकि वह अपने बल पर कहीं सत्ता में नहीं रही है, लेकिन विपक्ष की भूमिका निभाते हुए भी कर्म की दृष्टि से वह लकवाग्रस्त है। सीपीएम के पास कार्यकर्ता तो हैं पर कार्य नहीं है। परिवर्तन की राजनीति दोनों ही दलों ने छोड़ दी है इसलिए उनकी एकता के मायने नहीं।

वाम शासन के घोटाले जांचे कैग


पूर्ववर्ती वाम सरकार के घपलों और घोटालों की जांच के लिए पश्चिम बंगाल में विशेष ऑडिट कराया जाएगा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि दिवालिया होने के कगार पर खड़े सूबे को आर्थिक पटरी पर लाने के लिए केंद्र से मदद की गुहार की गई है। बनर्जी के अनुसार प. बंगाल को केंद्रीय मदद पर नजरिया बदलना होगा। उसे दूसरे राज्यों के समकक्ष नहीं रखा जा सकता है, क्योंकि यह राज्य अति पिछड़ा और गरीब बन चुका है। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी से मुलाकात के बाद पत्रकारों से बातचीत में बनर्जी ने कहा कि राज्य के खस्ताहाल होने की वजह तलाशने के लिए स्पेशल ऑडिट कराया जाएगा। इसके लिए नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (सीएजी) से आग्रह किया जाएगा। उन्होंने कहा कि पूर्ववर्ती वाम सरकार ने बंगाल की हालत इतनी खराब कर दी कि राज्य में बुजुर्गो, विधवाओं और विकलांगों की पेंशन तक बंद कर दी गई थी। गरीबों को राशन प्रणाली से रियायती अनाज बंद कर दिया गया था। वामपंथी सरकार ने केंद्र सरकार से मिले 17 हजार करोड़ के कर्ज को दो महीने में खर्च करने का रिकॉर्ड कायम किया था। उसमें भारी वित्तीय घपलों की आशंका है। बंगाल के आर्थिक पैकेज के बाबत पूछे सवालों को ममता टाल गई। उन्होंने कहा कि केंद्र को राज्य की स्थितियों से अवगत करा दिया गया है। इस पर विस्तार से अभी चर्चा होनी है। ममता मंगलवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी मुलाकात कर उनसे राज्य की राजनीतिक और आर्थिक हालत के बारे में चर्चा करेंगी। लोकपाल पर एक सवाल के जवाब में ममता ने कहा कि भ्रष्टाचार हटना चाहिए लेकिन हर राजनीतिज्ञ को भ्रष्टाचारी मान लेना ठीक नहीं। इंडिया गेट के चक्कर : मुख्यमंत्री के रूप में ममता बनर्जी सोमवार को पहली बार राजधानी दिल्ली आई। सबसे पहले उन्हें वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी से शाम पांच बजे मिलना था। उनके काफिले में सुरक्षा बलों और अधिकारियों की कोई एक दर्जन गाडि़यां थीं, लेकिन बनर्जी खुद अपनी पुरानी जेन में थीं, जिसे उनके निजी सचिव चला रहे थे। हवाई अड्डे से वह नॉर्थ ब्लॉक सवा चार बजे ही पहुंच गई। समय से पहले पहुंच जाने की वजह से उनका काफिला राजपथ की ओर एक बार फिर मुड़ गया। उनकी जेन गाड़ी इंडिया गेट के चक्कर काटने लगी। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि दीदी सोच क्या रहीं है। लगभग 15 मिनट बाद काफिला फिर नॉर्थ ब्लॉक पहुंच गया।


Wednesday, June 15, 2011

वाम एकजुटता के प्रस्ताव का निहितार्थ


पश्चिम बंगाल और केरल में अपनी तगड़ी पराजय के बाद लगता है कि सीपीएम (माकपा) ने एक सबक सीखा है। सीपीएम पोलित ब्यूरो के वरिष्ठ सदस्य सीताराम येचुरी के व्यापक वाम एकता के प्रस्ताव को इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए। हालांकि, येचुरी के इस बयान को सीपीआइ (भाकपा) अभी संदेह की दृष्टि से देख रही है। आखिर 50 साल के इतिहास में सीपीएम की तरफ से पहली बार आए वाम एकजुटता के इस प्रस्ताव पर सीपीआइ झटके में यकीन भी कैसे करे? सीपीआइ की तरफ से पहले हुए कई एकजुटता के प्रयासों को सीपीएम ने न सिर्फ खारिज कर दिया था, बल्कि खूब मखौल भी उड़ाती रही। सीपीआइ और राजनीतिक विश्लेषक येचुरी के बयान की मीमांसा करने में जुटे हैं। कहीं यह सीपीएम का पराजय के दंश को कम करने का प्रयास भर तो नहीं है या फिर वास्तव में इसके निहितार्थ तात्कालिक परिस्थितियों से आगे जाकर व्यापक वाम एकता का संकेत कर रहे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण बात यह भी है कि 1964 में संयुक्त साम्यवादी दल से निकल कर सीपीएम ने ही अलग खूंटा गाड़ा था। इस टूट के बाद सीपीआई ट्रेड यूनियनों से बाहर निकलकर जमीनी लड़ाई लड़ने में अक्षम रही। वहीं, सीपीएम ने सांगठनिक ढांचे और जुझारुपन से भारत में साम्यवाद आंदोलन का परचम खुद थाम लिया। पश्चिम बंगाल में सिद्धार्थ शंकर रे के दमन चक्र से लोहा लेने वाली भी सीपीएम ही थी। संभवत: इसीलिए, उसे यह अहंकार भी रहा कि भारत के साम्यवादी आंदोलन पर उसका एकाधिकार है। सीपीएम के नेता अक्सर सीपीआइ को कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंदिरा कहकर कटाक्ष करते थे। कुछ समय पहले तक सीपीएम का यही मानना रहा है कि सीपीआइ साम्यवाद के आवरण के नीचे छुपे सुविधावादियों, समझौतावादियों और सरकारपरस्त बुद्धिजीवियों का एक संगठन है। सीपीआइ का इतिहास इस धारणा को पुष्ट भी करता रहा है। भारत और सोवियत संघ में संबंधों का सबसे ज्यादा लाभ उसने ही उठाया और सौदेबाजी कर अपनी ट्रेड यूनियन की राजनीति भी खूब चमकाई। दूसरी ओर सीपीएम ने सिद्धांतों पर समझौता न करने की छवि बनाई। यहां तक कि उसने अपने वरिष्ठतम नेता ज्योति बसु के प्रधानमंत्री बनने के खिलाफ वीटो लगा दिया। यूपीए-एक को समर्थन देने के बावजूद सीपीएम कभी सत्ता के साथ समझौता करती नजर नहीं आई। अपने संघर्षशील इतिहास के कारण माकपा में एक वैचारिक दृढ़ता दिखती है। उसके विरोधी भी उसकी इस उपलब्धि की उपेक्षा नहीं कर सकते। ऐसे में हैदराबाद में माकपा की केंद्रीय समिति की बैठक के बाद दिए गए येचुरी के इस प्रस्ताव के पीछे सीपीएम की मंशा के निहितार्थ सीपीआइ व अन्य राजनीतिक विश्लेषक तलाश रहे हैं। सीपीएम का जैसा ढांचा है, उसमें यह प्रस्ताव येचुरी ने बिना चर्चा के दिया हो, यह मुमकिन नहीं लगता। फिर भी पूरी पार्टी के नेता इस प्रस्ताव पर कितना प्रतिपद्ध हैं, यह वक्त बताएगा। इस बात को भी नहीं नकारा जा रहा है कि सीपीएम ने यह अनौपचारिक पहल केवल तात्कालिक हार से पार्टी के भीतर चल रही उथल-पुथल को थामने के लिए की हो। अगर ऐसा है तो इसे किसी दीर्घकालिक दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। संभावना इस बात की भी ज्यादा है कि सीपीएम के मूल चरित्र में कोई बहुत परिवर्तन नहीं आया हो। दरअसल, सीपीएम की यह सोच रही है कि सीपीआइ कमजोर होकर समाप्त हो जाएगी और उसका एक बड़ा भाग सीपीएम के साथ स्वयं ही आ जाएगा। उस स्थिति में सीपीएम के लिए किसी शर्त को स्वीकार करने की मजबूरी नहीं होगी। यह समय बताएगा कि वैचारिक शुचिता और संागठनिक दृढ़ता की जिस बुनियाद पर सीपीएम ने अपने को अलग किया था, उसमें येचुरी का प्रस्ताव केवल रणनीतिक चाल है या फिर व्यापक वाम एकता का ईमानदाराना प्रयास!


वामपंथ का किला बचाने को माकपा व भाकपा कर सकते हैं विलय


राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथी विचारधारा के Oास को रोकने और विभिन्न राज्यों में वामपंथ के ढहते किले को बचाने के लिए निकट भविष्य में माकपा और भाकपा का विलय हो सकता है। विलय की समय सीमा और प्रक्रिया कितनी लंबी होगी, अभी यह नहीं बताया जा सकता। मा‌र्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) पोलित ब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी ने सोमवार को दोनों दलों के विलय के संकेत दिए। येचुरी ने सोमवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा, दोनों दलों का विलय चाहे कितना ही वांछित क्यों नहीं हो, उसे एक खास प्रक्रिया से गुजरना होगा। इसे करने का एक तरीका विभिन्न जन संगठनों का एकीकरण और निचले स्तर पर संयुक्त गतिविधियां है। मैं समझता हूं कि ज्यादा टिकाऊ रास्ता यही है, इसके बजाय कि नेतृत्व स्तर पर एकीकरण हो। यह प्रक्रिया चल रही है और दोनों पार्टियां जनसंगठन स्तर पर एक साथ काम कर रही हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या यह प्रक्रिया अंतत: दोनों दलों को विलय की तरफ ले जाएगी तो उन्होंने कहा, उम्मीद है कि ऐसा होगा। हालांकि हम इसी कोई समय सीमा नहीं दे सकते, लेकिन वामपंथ के सभी शुभचिंतक चाहते हैं कि यह यथाशीघ्र हो। माकपा नेता ने भ्रष्टाचार से संघर्ष के प्रति अपनी पार्टी की वचनबद्धता जाहिर करते हुए कहा,माकपा ने समग्र भ्रष्टाचार निरोधी उपायों की मांग की है जिनमें प्रधानमंत्री को दायरे में लाते हुए प्रभावी लोकपाल कानून का निर्माण,न्यायपालिका पर निगरानी के लिए राष्ट्रीय न्यायिक आयोग के गठन और चुनाव में धनबल पर अंकुश लगाने के लिए चुनाव सुधार शामिल है। हजारे और बाबा रामदेव के अभियान के बारे में पूछे जाने पर येचुरी ने कहा, उन्होंने जो मुद्दा उठाया है वह अहम है, पर मैं नहीं समझता कि कोई यह दावा कर सकता है कि वे समूचे नागरिक समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। हम क्या हैं? गैर नागरिक समाज :अनसिविल सोसाइटी:? हर कोई नागरिक समाज का हिस्सा है। उन्होंने कहा, वह मतदाताओं पर हजारे के बयान से असहमत हैं। मतदाताओं और चुनावी लोकतंत्र के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी नहीं की जानी चाहिए क्योंकि इन्हीं मतदाताओं ने एक बार आपातकाल के थोपे जाने और देश पर सांप्रदायिकता के थोपे जाने को शिकस्त दी है।


Saturday, January 8, 2011

वामपंथी उग्रवाद को लेकर सरकार चिंतित

केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने मंगलवार को कहा कि नक्सलियों ने सरकार की वार्ता की पेशकश को न केवल ठुकरा दिया बल्कि हिंसा तेज कर दी है। चिदंबरम ने कहा यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा कि वामपंथी उग्रवाद प्रभावित राज्यों को लेकर अभी चिंता कायम है। पश्चिम बंगाल के सिल्दा, छत्तीसगढ़ के दंतेवाडा और बीजापुर, नारायणपुर, धौधई में जानमाल की भारी हानि हुई। उन्होंने बताया कि नक्सलियों ने 2010 में 713 लोगों की हत्या की जबकि 2009 में यह आंकड़ा 591 था। 2010 में सुरक्षाबलों के 285 कर्मी नक्सलियों के साथ मुठभेड़ के दौरान शहीद हुए, हालांकि 2009 में यह आंकड़ा 317 था। 2010 में सुरक्षाबलों ने 171 नक्सली मार गिराए जबकि 2009 में यह आंकड़ा 219 था।