वामपंथी एकता की बात लंबे अरसे से कही जा रही है। सोवियत संघ का पराभव होने और चीनी गणतंत्र द्वारा दाई ओर मुड़ जाने के बाद भारत के दोनों प्रमुख दलों सीपीएम और सीपीएम के अलग रहने का कोई औचित्य नहीं रहा। 1964 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के विभाजन का आधार सैद्वांतिक नहीं था। दोनों धड़ों में से किसी ने भी वाम की कोई नई व्याख्या पेश नहीं की थी। मुद्दा यह था कि आप सोवियत संघ के पिछलग्गू हैं या चीन के। जब सोवियत संघ ही नहीं रहा तब सीपीआइ के लिए कोई काम ही नहीं बचा। दूसरी ओर सीपीएम का चीन से मोहभंग बढ़ता गया है। इसलिए दोनों पार्टियों के मतभेद खत्म हो चुके हैं। फिर भी दोनों के विलय की स्थिति नहीं बन पाई है तो इसीलिए कि कहीं जमींदार और किसान का विलय होता है। यही वजह है कि सीपीएम ने सीपीआइ को पश्चिम बंगाल और केरल के वाम मोर्चा में शामिल तो कर लिया पर उसे विलय के लिए आमंत्रित करने का विचार उसके मन में कभी आया ही नहीं। पश्चिम बंगाल में सीपीएम की हार उसके लिए लोमहर्षक घटना थी। जो पार्टी अपने को अजेय मानने की आदत का शिकार हो गई थी उसे अचानक जमीन सूंघनी पड़ी। शोक के इसी माहौल में सीपीएम के एक बड़े नेता ने अपने भाषण में इस आशय का संकेत दे दिया कि आज वामपंथी एकता की जरूरत है। यह वास्तव में पतंग उड़ाना भी नहीं था, क्योंकि इस विषय पर पार्टी के किसी मंच पर चर्चा तक नहीं हुई थी। यह संकेत उस नेता का स्फुट विचार था जो उसके भाषण में पता नहीं कहां से रेंगते हुए आ गया था। यह बात भी रही होगी कि पराजय के बाद कुछ अच्छी बातें कहनी चाहिए ताकि श्रोता समझें कि वक्ता वामपंथ के भविष्य के बारे में वाकई चिंतित है। राजनीति में ही नहीं जीवन के किसी भी क्षेत्र में झूठी उम्मीद पैदा करना अच्छा नहीं होता। इस संकेत से सीपीआइ को अचानक लगने लगा कि उसके दरवाजे पर भविष्य ने दस्तक दी है। तत्काल उसके नेताओं ने वामपंथी एकता के विचार का स्वागत करते हुए ऐसे बयान देना शुरू कर दिया जिससे साबित होता है कि भारत की राजनीति में परिपक्वता खोज पाना जासूसों के लिए ही संभव है। दो दलों की एकता खासकर वाम दलों की एकता इतनी साधारण या आसान चीज नहीं है कि उसे मीडिया के माध्यम से संपन्न किया जा सके। वामपंथी एकता कोई आर्यसमाजी विवाह नहीं है कि सुबह सोचा और शाम को निपट गया। जाहिर है सीपीआइ बरसों से, बल्कि दशकों से इसी क्षण का इंतजार कर रही थी। बच्चन के शब्दों में खड़ा रहा इसीलिए कि तुम मुझे पुकार लो, लेकिन उसका स्वप्नभंग होने में हफ्ता भर भी नहीं लगा। सीपीएम की ओर से सफाई आ गई कि हमारे मन में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है। दरअसल, वामपंथी एकता का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है। राजनीति में एकता के पीछे दो इरादे होते हैं। एक इरादा होता है दांतकाटी रोटी का रिश्ता बनाने का। अकेले कुछ करना मुश्किल हो रहा है इसलिए हम दोनों साथ हो जाएंगे तो महाभोज का प्रबंध हो सकता है। इसी लालच में बसपा ने उत्तर प्रदेश में पहले समाजवादी पार्टी, फिर भारतीय जनता पार्टी से हाथ मिलाया। चूंकि स्वार्थ की एकता अधिक समय तक टिकती नहीं है, इसलिए दोनों ही गठबंधन नापाएदार निकले और जितनी तेजी से बने थे, उतनी ही जल्द भहरा भी गए। सीपीएम और सीपीआइ के विलय से सत्ता की संभावना बढ़ रही होती तो वामपंथी एकता का विचार निश्चय ही आकर्षक होता। चूंकि ये दोनों पार्टियां एक-दूसरे का वोट काटती नहीं हैं और सीपीआइ एक बुझता हुआ चिराग है इसलिए उसका विलय स्वीकार कर सीपीएम को क्या मिलने वाला है? राजनीतिक एकता या विलय के पीछे दूसरा इरादा किसी सिद्धांत या विचारधारा को मजबूत करना और उसे जनता के बीच ले जाने की रचनात्मक बेचैनी होती है। इस संदर्भ में 1977 में चार दलों की एकता को याद किया जा सकता है। इमरजेंसी के कटु अनुभव के बाद चारों दलों का विलय इसीलिए संभव हुआ कि देश में जागरूकता और आशा-आकांक्षा का एक नया वातावरण बना था जिसे बनाए रखने के लिए एक नई तरह की राजनीति की जरूरत थी। पर यह प्रयोग दो वर्ष भी नहीं चल सका, क्योंकि इस नई राजनीति की कोई शक्ल नहीं उभर सकी। जब सिद्धांत और नीति का कोई दबाव न रह जाए तो आदमियों की तरह दलों की भी क्षुद्रताएं प्रगट होने लगती हैं। इन क्षुद्रताओं का भार जनता पार्टी नहीं संभाल सकी और उसने इतिहास के कूड़ेदान में छलांग मार दी। क्या वामपंथी एकता का हश्र कुछ ऐसा ही नहीं होगा? नाम को छोड़ दिया जाए तो सीपीएम और सीपीआइ में से किसे वामपंथी पार्टी कहा जा सकता है। नाम की तरह वचन को भी छोडि़ए तो इनके कर्म में किस वामपंथ के दर्शन होते हैं। यदि प. बंगाल में सीपीएम ने वामपंथ को जीवित रखा होता तो वह न केवल उस राज्य का नवनिर्माण करने में सफल होती बल्कि देश के दूसरे हिस्सों में भी अपने पांव जमा सकती थी। सीपीआइ के बोल ज्यादा सुहावने होते हैं, क्योंकि वह अपने बल पर कहीं सत्ता में नहीं रही है, लेकिन विपक्ष की भूमिका निभाते हुए भी कर्म की दृष्टि से वह लकवाग्रस्त है। सीपीएम के पास कार्यकर्ता तो हैं पर कार्य नहीं है। परिवर्तन की राजनीति दोनों ही दलों ने छोड़ दी है इसलिए उनकी एकता के मायने नहीं।
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Wednesday, June 29, 2011
वामपंथी एकता
वामपंथी एकता की बात लंबे अरसे से कही जा रही है। सोवियत संघ का पराभव होने और चीनी गणतंत्र द्वारा दाई ओर मुड़ जाने के बाद भारत के दोनों प्रमुख दलों सीपीएम और सीपीएम के अलग रहने का कोई औचित्य नहीं रहा। 1964 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के विभाजन का आधार सैद्वांतिक नहीं था। दोनों धड़ों में से किसी ने भी वाम की कोई नई व्याख्या पेश नहीं की थी। मुद्दा यह था कि आप सोवियत संघ के पिछलग्गू हैं या चीन के। जब सोवियत संघ ही नहीं रहा तब सीपीआइ के लिए कोई काम ही नहीं बचा। दूसरी ओर सीपीएम का चीन से मोहभंग बढ़ता गया है। इसलिए दोनों पार्टियों के मतभेद खत्म हो चुके हैं। फिर भी दोनों के विलय की स्थिति नहीं बन पाई है तो इसीलिए कि कहीं जमींदार और किसान का विलय होता है। यही वजह है कि सीपीएम ने सीपीआइ को पश्चिम बंगाल और केरल के वाम मोर्चा में शामिल तो कर लिया पर उसे विलय के लिए आमंत्रित करने का विचार उसके मन में कभी आया ही नहीं। पश्चिम बंगाल में सीपीएम की हार उसके लिए लोमहर्षक घटना थी। जो पार्टी अपने को अजेय मानने की आदत का शिकार हो गई थी उसे अचानक जमीन सूंघनी पड़ी। शोक के इसी माहौल में सीपीएम के एक बड़े नेता ने अपने भाषण में इस आशय का संकेत दे दिया कि आज वामपंथी एकता की जरूरत है। यह वास्तव में पतंग उड़ाना भी नहीं था, क्योंकि इस विषय पर पार्टी के किसी मंच पर चर्चा तक नहीं हुई थी। यह संकेत उस नेता का स्फुट विचार था जो उसके भाषण में पता नहीं कहां से रेंगते हुए आ गया था। यह बात भी रही होगी कि पराजय के बाद कुछ अच्छी बातें कहनी चाहिए ताकि श्रोता समझें कि वक्ता वामपंथ के भविष्य के बारे में वाकई चिंतित है। राजनीति में ही नहीं जीवन के किसी भी क्षेत्र में झूठी उम्मीद पैदा करना अच्छा नहीं होता। इस संकेत से सीपीआइ को अचानक लगने लगा कि उसके दरवाजे पर भविष्य ने दस्तक दी है। तत्काल उसके नेताओं ने वामपंथी एकता के विचार का स्वागत करते हुए ऐसे बयान देना शुरू कर दिया जिससे साबित होता है कि भारत की राजनीति में परिपक्वता खोज पाना जासूसों के लिए ही संभव है। दो दलों की एकता खासकर वाम दलों की एकता इतनी साधारण या आसान चीज नहीं है कि उसे मीडिया के माध्यम से संपन्न किया जा सके। वामपंथी एकता कोई आर्यसमाजी विवाह नहीं है कि सुबह सोचा और शाम को निपट गया। जाहिर है सीपीआइ बरसों से, बल्कि दशकों से इसी क्षण का इंतजार कर रही थी। बच्चन के शब्दों में खड़ा रहा इसीलिए कि तुम मुझे पुकार लो, लेकिन उसका स्वप्नभंग होने में हफ्ता भर भी नहीं लगा। सीपीएम की ओर से सफाई आ गई कि हमारे मन में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है। दरअसल, वामपंथी एकता का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है। राजनीति में एकता के पीछे दो इरादे होते हैं। एक इरादा होता है दांतकाटी रोटी का रिश्ता बनाने का। अकेले कुछ करना मुश्किल हो रहा है इसलिए हम दोनों साथ हो जाएंगे तो महाभोज का प्रबंध हो सकता है। इसी लालच में बसपा ने उत्तर प्रदेश में पहले समाजवादी पार्टी, फिर भारतीय जनता पार्टी से हाथ मिलाया। चूंकि स्वार्थ की एकता अधिक समय तक टिकती नहीं है, इसलिए दोनों ही गठबंधन नापाएदार निकले और जितनी तेजी से बने थे, उतनी ही जल्द भहरा भी गए। सीपीएम और सीपीआइ के विलय से सत्ता की संभावना बढ़ रही होती तो वामपंथी एकता का विचार निश्चय ही आकर्षक होता। चूंकि ये दोनों पार्टियां एक-दूसरे का वोट काटती नहीं हैं और सीपीआइ एक बुझता हुआ चिराग है इसलिए उसका विलय स्वीकार कर सीपीएम को क्या मिलने वाला है? राजनीतिक एकता या विलय के पीछे दूसरा इरादा किसी सिद्धांत या विचारधारा को मजबूत करना और उसे जनता के बीच ले जाने की रचनात्मक बेचैनी होती है। इस संदर्भ में 1977 में चार दलों की एकता को याद किया जा सकता है। इमरजेंसी के कटु अनुभव के बाद चारों दलों का विलय इसीलिए संभव हुआ कि देश में जागरूकता और आशा-आकांक्षा का एक नया वातावरण बना था जिसे बनाए रखने के लिए एक नई तरह की राजनीति की जरूरत थी। पर यह प्रयोग दो वर्ष भी नहीं चल सका, क्योंकि इस नई राजनीति की कोई शक्ल नहीं उभर सकी। जब सिद्धांत और नीति का कोई दबाव न रह जाए तो आदमियों की तरह दलों की भी क्षुद्रताएं प्रगट होने लगती हैं। इन क्षुद्रताओं का भार जनता पार्टी नहीं संभाल सकी और उसने इतिहास के कूड़ेदान में छलांग मार दी। क्या वामपंथी एकता का हश्र कुछ ऐसा ही नहीं होगा? नाम को छोड़ दिया जाए तो सीपीएम और सीपीआइ में से किसे वामपंथी पार्टी कहा जा सकता है। नाम की तरह वचन को भी छोडि़ए तो इनके कर्म में किस वामपंथ के दर्शन होते हैं। यदि प. बंगाल में सीपीएम ने वामपंथ को जीवित रखा होता तो वह न केवल उस राज्य का नवनिर्माण करने में सफल होती बल्कि देश के दूसरे हिस्सों में भी अपने पांव जमा सकती थी। सीपीआइ के बोल ज्यादा सुहावने होते हैं, क्योंकि वह अपने बल पर कहीं सत्ता में नहीं रही है, लेकिन विपक्ष की भूमिका निभाते हुए भी कर्म की दृष्टि से वह लकवाग्रस्त है। सीपीएम के पास कार्यकर्ता तो हैं पर कार्य नहीं है। परिवर्तन की राजनीति दोनों ही दलों ने छोड़ दी है इसलिए उनकी एकता के मायने नहीं।
Tuesday, June 14, 2011
विचारधारा, विचार और संवेदना
को ई भी प्रगतिशील विचारधारा संवेदना के विकास से पैदा होती है। चूंकि विचार का जन्म संवेदना से होता है, इसलिए हर प्रगतिशील विचारधारा संवेदना का ही विकसित और व्यवस्थित रूप होती है। जब संवेदना सीमित या विकृत हो जाती है, तब उससे गलत विचार पैदा होते हैं और वे गलत विचारधारा को जन्म देते हैं। इसे मार्क्स, हिटलर, गांधी और गोडसेवादियों की तुलना कर अच्छी तरह समझा जा सकता है। पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के साथ जो हादसा हुआ, उससे यह बहस शुरू हो गई है कि क्या यह भारत में विचारधारा के अंत का समय है ? यह सवाल बहुत ही हास्यास्पद है क्योंकि दो विचारधाराएं कमजोर होती दिखाई पड़ रही हैं और एक विचारधारा तेजी से बढ़ रही है। जो विचारधारा मजबूत हो रही है, वह पूंजी और बाजार की स्वतंत्रता की है। इस विचारधारा के तहत माना जाता है कि सरकार को आर्थिक गतिविधियों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, उन्हें बाजार के हवाले कर देना चाहिए। इसके पीछे तर्क यह है कि प्रतियोगिता के कारण उत्पादनकर्ता और वितरक हमेशा उपभोक्ता की इच्छा के अनुसार चलेंगे और उन्हें कम से कम दर पर अधिक से अधिक सुविधाएं प्रदान करेंगे। यह तर्क एक हद तक ही सही है।
बराबरी नहीं पूंजीवाद में
पूंजीवाद की व्यवस्था में इस बात के लिए कोई प्रावधान नहीं है कि देश के सभी लोग बाजार के एक जैसे, बराबर सदस्य कैसे बनें? ‘क’ का बेटा पढ़ने के लिए विदेश जाए और ‘ख’ का बेटा किसी झोपड़ीनुमा स्कूल में पढ़ने के नाम पर समय बरबाद करे, यह किसी स्वस्थ समाज का कायदा नहीं हो सकता। निजी पूंजी का लक्ष्य अधिक से अधिक मुनाफा कमाना है। नागरिक हितों की चिंता करना नहीं जबकि भारत की सबसे बड़ी समस्या यह है कि देश के 80 प्रतिशत लोग बाजार की अर्थव्यवस्था में कैसे प्रवेश करें? जिस विचारधारा में इस सरोकार के लिए कोई जगह नहीं है, वह स्पष्ट रूप से जन विरोधी है। लेकिन भारत का प्रभावशाली तबका पूंजीवाद को प्रश्रय दे रहा है क्योंकि उसकी संवेदना का दायरा अपने वर्ग से बाहर नहीं जाता। दुर्भाग्य यह है कि पूंजीवाद को विचारधारा नहीं, स्वाभाविक जीवन पद्धति के रूप में प्रतिपादित किया जाता है। इसीलिए जब विचारधारा की मृत्यु की विजय घोषणा की जाती है, तब यह तथ्य छिपा लिया जाता है कि पूंजीवाद भी एक विचारधारा है और यह विचारधारा तेजी से दुनिया भर में अपनी जगह बना रही है। देश में एक और विचारधारा अभी हाल तक मजबूत होती दिखाई पड़ रही थी। सुविधा के लिए इसे हम भाजपावाद कह सकते हैं। यह विचारधारा मुसलमान और ईसाई समूहों के प्रति असहिष्णुता पर आधारित है। इसका लक्ष्य हिन्दू समाज का सुधार करना नहीं है। यहां तक कि वह दलित प्रश्न पर भी उद्वेलित नहीं होती। उसका लक्ष्य सिर्फ इतना है कि हिन्दू संगठित हों और अप्रासंगिक हो चुके हिन्दू खयालों को फिर से स्थापित करें तथा मुसलमानों और ईसाइयों को दूसरे दर्जे का नागरिक बना डालें। बाबरी मस्जिद का ध्वंस इस विचारधारा का शिखर बिंदु था। उसके बाद ही भाजपा केंद्र की सत्ता में आई लेकिन उसके शासन में कोई जनवादी तत्व नहीं था। भाजपावाद के पराभव का कारण यही था कि वह देश की अधिकांश जनता की वास्तविक समस्याओं के प्रति संवेदनशील नहीं था।
यह मुखौटे का अंत है
जहां तक वामपंथी विचारधारा के अंत का सवाल है, हमारा मानना यह है कि जो खत्म हो रहा है, वह वामपंथ की विचारधारा नहीं बल्कि उसका मुखौटा है। कोई भी मुखौटा असली चेहरे का काम नहीं कर सकता। केरल में वामपंथ काफी हद तक बचा हुआ है और हो सकता है अगली बार उसी की सरकार बने। लेकिन वामपंथ की असली कसौटी केरल नहीं, पश्चिम बंगाल है। केरल में कांग्रेस और वामपंथ, दोनों बारी-बारी से सत्ता में आते रहे हैं। इसलिए आज का केरल दोनों प्रकार की सत्ताओं के कार्यकलाप का संयुक्त परिणाम है। दूसरी तरफ, पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा 34 वर्षों से लगातार शासन करता आ रहा है। इन 34 वर्षों में उसकी संवेदना का लगातार ह्रास होता गया है। सिंगुर, नंदीग्राम और जंगल महल में तो उसकी संवेदना क्रूरता में बदल गई। क्या इसे वामपंथ का रास्ता कहा जा सकता है? संवेदना का संकुचन हुआ, तो विचारों में भी परिवर्तन आया। नए विचार जन विरोधी थे। इसीलिए जनता ने विद्रोह कर दिया। इसे हम मार्क्सवाद की पराजय नहीं कह सकते क्योंकि जन आक्रोश के निशाने पर मार्क्सवाद नहीं उसका एक भोथरा, क्रूर और संवेदनारहित संस्करण था। इसके बरक्स, हम देख रहे हैं कि माओवाद कमजोर नहीं, मजबूत हो रहा है। केंद्र की सरकार कई वर्षों से उसके पीछे पड़ी हुई है पर उसे कोई सफलता नहीं मिल सकी है।
माओवाद में लोकतंत्र आए
माओवाद मार्क्सवाद का एक विकृत रूप है। इसलिए माओवाद की सफलता, हमारी दृष्टि में, मार्क्सवादी विचारधारा की सफलता नहीं है। फिर भी माओवाद की अपनी एक विचारधारा तो है ही। जैसे पूंजीवाद के रहते हुए यह दावा नहीं किया जा सकता कि विचारधारा का अंत हो गया, उसी तरह माओवाद के रहते हुए हम विचारधारा के अंत की घोषणा नहीं कर सकते। कह सकते हैं कि छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, बिहार, उड़ीसा आदि राज्यों में पूंजीवाद और माओवाद के बीच खूनी संघर्ष चल रहा है। हम यह दावा करना चाहते हैं कि जब तक पूंजीवाद देश के शासक वर्ग द्वारा गोद ली हुई विचारधारा बना हुआ है, तब तक उसके विरुद्ध किसी न किसी रूप में संघर्ष जारी रहेगा। माओवाद को बड़े पैमाने पर सफलता तभी मिल सकेगी, जब उसमें लोकतंत्र को शामिल किया जाए और जनता पर शासन के बदले जनता का शासन शुरू किया जाए। जब विचारधाराएं जन हित का औजार नहीं रह जातीं, तब विचार का जन्म होता है। संवेदना विचार और विचारधारा, दोनों की जननी है और इतिहास का सत्य है कि किसी भी समाज में कभी भी संवेदना का अंत नहीं होता।
संवेदनशीलता की जीत
पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा के लंबे शासन को ध्वस्त करने वाली ममता बनर्जी की कोई अपनी विचारधारा है-यह दावा न वे खुद करती हैं और न उनके समर्थक। वामपंथ पर ममता की जीत शुद्ध रूप से संवेदनहीनता पर संवेदनशीलता की जीत है। जहां भी शोषण-उत्पीड़न दिखाई पड़ा, ममता वहां दौड़ पड़ीं। हर मुद्दे पर उन्होंने जो विचार व्यक्त किए, उनके पीछे कोई विचारधारा नहीं, उनकी उत्कट जन संवेदना थी। जब तक उनकी यह संवेदना बची रहेगी, उनकी सत्ता भी कायम रहेगी लेकिन इस मामले में ममता अकेली नहीं हैं। मेधा पाटकर, जो बड़े बांधों और विस्थापन के मुद्दों पर संघर्ष करती आ रही हैं, एक विचार हैं। अरुणा राय भी, जिनके संघर्ष ने सूचना के अधिकार का कानून बनाया, एक सशक्त विचार हैं। अण्णा हजारे का आंदोलन भी एक महत्वपूर्ण विचार है। भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध तथा उचित मुवायजे के पक्ष में लड़ रहे किसानों के पास भी एक विचार है। पर्यावरण प्रेमी वंदना शिवा और सुनीता नारायण भी एक विचार हैं। दलितवाद और नारीवाद के रूप में कई प्रगतिशील विचार काम कर रहे हैं। पिछड़ावाद भी एक प्रगतिशील विचार था, पर अब यह काफी हद तक समाज-विरोधी हो चुका है। कह सकते हैं कि सभी स्थापित विचारधाराओं ने जनता के साथ विासघात किया है, इसलिए जनता का नेतृत्व कुछ फुटकर विचार ही कर रहे हैं। गौर करें कि इन सभी विचारों के पीछे सघन संवेदना है। विचारधाराएं जब संवेदनाविहीन हो जाती हैं, तब संवेदना के दबाव से नए विचार पैदा होते हैं और जन असंतोष की अभिव्यक्ति करते हैं। क्या ही अच्छा होता, अगर इन विचारों को एक सूत्र में बांध कर किसी नई विचारधारा को जन्म दिया जाता। लेकिन विचारधाराओं की तानाशाही को देख कर यह वांछित ही लगता है कि हम ऐसे विचारों से प्रेरित हों जो हमारी संवेदना को जगाते हैं और उसे पुष्ट करते हैं। किसी खास विचारधारा पर आधारित समाज बने, इससे बेहतर है कि उसका निर्माण संवेदना पर आधारित हो। आखिर संवेदना ही एक आदमी को दूसरे आदमी से और सभी आदमियों को समाज से जोड़ती है। जिस राजनीति में संवेदना का क्षय हो जाए, उसके पीछे जितनी भी ऊंची विचारधारा हो, वह टिक नहीं सकती। इसके विपरीत, संवेदना से जन्म लेने वाली राजनीति हमेशा असरदार और दीर्घायु होती है।
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