माकपा नेता सीताराम येचुरी ने चीन सरकार के एक वरिष्ठ नेता के हवाले से कहा है कि साम्यवादी देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के स्थायी सदस्य बनने के खिलाफ नहीं है। माकपा नेता का यह बयान काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि भारत इस मसले पर लंबे समय से बीजिंग की चुप्पी तोड़ने की कोशिश कर रहा है। चीन ही सुरक्षा परिषद का एकमात्र देश है जिसने स्थायी सदस्यता पर भारत के दावे का न तो समर्थन किया है और न ही इसे खारिज किया है। अमेरिका, ब्रिटेन, रूस और फ्रांस इस मामले में खुलकर भारत का समर्थन कर चुके हैं। हालांकि चीन ने संकेत दिया है कि स्थायी सदस्यता पर जी-4 देशों की संयुक्त दावेदारी की वजह से वह भारत को खुलकर समर्थन नहीं दे पा रहा है। जी-4 देश ब्राजील, जर्मनी, जापान और भारत का समूह है। इन देशों ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए सामूहिक रूप से एक दूसरे की दावेदारी को मजबूत करने का फैसला किया है। येचुरी ने कहा कि साम्यवादी देश स्थायी सदस्यता पर जापान के दावे के सख्त खिलाफ है क्योंकि उसके साथ चीन की ऐतिहासिक दिक्कतें रही हैं और दोनों के बीच खटास कम नहीं हुई है। येचुरी के हवाले से ही सही, चीन ने शायद यह कहने की कोशिश की है कि अगर भारत जी-4 देशों से नाता तोड़कर अपनी दावेदारी पेश करता है तो वह खुलकर उसके समर्थन में आने का एलान कर सकता है। माकपा पोलित ब्यूरो के सदस्य येचुरी को शीर्ष चीनी दूत एवं स्टेट काउंसलर डाई बिंगुओ ने चीन के रुख की जानकारी दी। डाई के साथ शुक्रवार को दो घंटे तक चली बैठक के बाद येचुरी ने भारतीय मीडिया से कहा, उन्होंने मुझे बताया कि वे भारत के सुरक्षा परिषद के सदस्य बनने के खिलाफ नहीं हैं। बकौल येचुरी उन्होंने कहा, सुरक्षा परिषद में भारत के स्थायी सदस्य होने से चीन को आपत्ति नहीं है। भारत, भारत है न कि जी-4 का सदस्य। उन्होंने कहा, शायद पहली बार है जब भारत को लेकर चीन के रुख में स्पष्टता आई है। बकौल येचुरी साम्यवादी देश के दूत ने कहा, चीन को भारत के समर्थन में आने में समस्या है क्योंकि भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए जी-4 का सदस्य बन गया है। बिंगुओ ने येचुरी से साफ शब्दों मे कहा कि हमारे लिए जापान के साथ ऐतिहासिक समस्या है और चीन कभी भी जापान की सदस्यता स्वीकार नहीं कर सकता। गौरतलब है कि स्थायी सदस्यता के मसले पर समर्थन हासिल करने के मकसद से भारत लंबे समय से चीन सरकार के प्रतिनिधियों से वार्ता कर रहा है। विदेश मंत्री एसएम कृष्णा और विदेश सचिव निरुपमा राव ने आधिकारिक और अनौपचारिक मुलाकात के दौरान कई बार चीनी प्रतिनिधियों का मन टटोलने की कोशिश की है लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। पिछले साल नत्थी वीजा के मसले पर तीखे मतभेद उभर आने के बाद वार्ता में गतिरोध आ गया था जिसे दोनों देश पटरी पर लाने में जुटे हुए हैं। सुरक्षा परिषद के अन्य चार देशों द्वारा स्थायी सदस्यता के मामले में भारत के पक्ष में खुलकर आ जाने से भी चीन पर कूटनीतिक दबाव पड़ रहा है कि वह अपनी मंशा जाहिर करे और ताजा घटनाक्रम को इस दिशा में साम्यवादी देश की बड़ी पहल माना जा सकता है। चीन का यह कदम को स्थायी सदस्यता के लिए एक दूसरे की दावेदारी को मजबूत कर रहे जी-4 देशों की एकता को तोड़ने की रणनीति भी हो सकती है।
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