उग्र वामपंथ के मुद्दे पर वर्धा घोषणापत्र के इस निष्कर्ष का स्वागत होना चाहिए कि देश के विभिन्न हिस्सों में स्वाधीनता आंदोलन और भारतीय संविधान में उल्लिखित मूल्यों के खिलाफ बनाये गये और लागू किये जाने वाले कानूनों की पुनर्समीक्षा की जाए, संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल किये गये लक्ष्यों को तत्काल अमल में लाया जाए और संविधान की प्रस्तावना तथा संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों, मानवाधिकारों और नागरिक अधिकारों की रक्षा की गारंटी सुनिश्चित की जाए
यह खुशी की बात है कि वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय ने 'भारत में उग्र वामपंथ के मुद्दे' विषय पर एक घोषणा पत्र जारी कर समस्या के समाधान की प्रत्याशा में राष्ट्रीय पहल की है। विश्वविद्यालय के कुलपति विभूतिनारायण राय के निमंतण्रपर देश भर से आये चिंतकों और एक्टिविस्टों ने गत 30 व 31 मार्च को इस विषय पर गंभीर विमर्श करने के बाद सर्व सहमति से यह घोषणा पत्र जारी किया। इस महत्वपूर्ण विमर्श में न्यायमूर्ति पीवी सांवत, प्रो. राम दयाल मुंडा, असगर अली इंजीनियर, संदीप पांडेय, विभूतिनारायण राय, राधा भट्ट, वासंती रामन, शीतला सिंह, रमेश दीक्षित, आलोक धन्वा, गिरीश मिश्र, एचएस सक्सेना, प्रो. ए. अरविंदाक्षन, शम्सुल इस्लाम, प्रो. नदीम हसनैन और इलीना सेन समेत दर्जनों अध्येता शामिल थे। वर्धा घोषणापत्र की मूल मान्यता यह है कि देश के विभिन्न भागों विशेषकर जनजाति बहुल इलाकों में जनजातीय संस्कृति विकास की मौजूदा अवधारणाओं के कारण संकटग्रस्त है। विभिन्न जनजातीय समूह, भारतीय राज्य की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक नीतियों के कारण स्वयं को उपेक्षित और उत्पीड़ित महसूस करते हैं। राज्य के द्वारा जनजातीय क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन औद्योगिक कारपोरेट घरानों के हित में किए जाने के कारण भी इन क्षेत्रों की जनता, भारतीय राज्य से अपने को अलगथ लग मानने लगी है। जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय आदिवासी समूहों के स्वामित्व को राज्य द्वारा औपचारिक स्वीकृति प्रदान करने और नीति निर्माण की प्रक्रियाओं में स्थानीय जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने से ही राज्य और जनसामान्य के बीच का अलगाव खत्म किया जा सकता है। सवाल यह है कि इस दिशा में कैसे आगे बढ़ा जाए। आखिरकार संवाद ही एकमात्र रास्ता है जिस पर चलते हुए दोनों पक्ष एक-दूसरे के नजरिए को समझ सकते हैं और सहमति के बिंदु उभर सकते हैं। यह बात इस घोषणापत्र में भी दोहराई गई है। कहा गया है कि राज्य और जनजातीय समूहों के बीच बढ़ते अविश्वास और अलगाव को भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती मानते हुए राज्य और जनजातीय समूहों के बीच विभिन्न नागरिक संगठनों के माध्यम से तत्काल संवाद शुरू किये जाने की जरूरत है। इस तरह का कोई भी संवाद शुरू करने की पहल राज्य की ओर से होनी चाहिए। राज्य द्वारा चलाए जा रहे ऑपरेशन 'ग्रीन हंट' पर तत्काल रोक लगाई जाए। साथ ही हथियारबंद संगठनों को भी अपनी हिंसात्मक गतिविधियां तत्काल बंद कर देनी चाहिए। कुछ और लोगों ने भी इसी तरह की राय प्रकट की है। स्वामी अग्निवेश तो, निज की पहल पर कई कदम आगे बढ़ गए थे। मेरी समझ से यह रास्ता व्यावहारिक नहीं है। इस बारे में सचाई यही है कि कुछ समूह ऐसे होते हैं, जिनसे बातचीत हो ही नहीं सकती और की जाएगी तो उसका कोई नतीजा नहीं निकलेगा। उदाहरण के लिए, राम जन्मभूमि मंदिर वालों से कई बार बातचीत हुई। अब भी कुछ अति आशावादी लोग उम्मीद से हैं। 'जन मोर्चा' के संपादक तथा प्रेस काउंसिल के सदस्य रह चुके शीतला सिंह आजकल अयोध्या विवाद को लेकर अपने संस्मरण लिख रहे हैं। उनका मानना है कि मामला राजनीतिक हो, तो उसे बातचीत द्वारा हल करने की उम्मीद करना आत्म-छलना है। इस संबंध में एक और उदाहरण लें। कश्मीर के अलगाववादियों से बातचीत कर क्या हासिल होगा? माओवाद को किसी भी तर्क से इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इसमें जनवाद के तत्व हैं। पर मामला राजनीतिक है। दो परस्पर विरोधी राजनीतिक धाराएं एक-दूसरे से वैसे ही मिलती हैं जैसे शमशीर शमशीर से टकराती है। लेकिन संवाद की और भी शक्लें हैं। इस मामले में संवाद का तरीका यह होगा कि पहल कहीं और से की जाए। बादल आकाश में बनते हैं। तब जमीन पर बारिश होती है। इसलिए उग्र वामपंथ से निपटने के लिए जरूरी है कि विकास का काम उन जनजातीय इलाकों से शुरू किया जाए जहां तक माओवाद का असर नहीं पहुंचा है। ऐसे इलाके संख्या में अल्प नहीं हैं। न इनकी जनसंख्या उंगलियों पर गिनने लायक है। इन इलाकों में पहुंच कर सरकार दिखाए कि जनजातियों की जीवन स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए वह क्या-क्या कर सकती हैं। वहां की जनजातियां जितनी प्रसन्न होंगी, सरकार की साख, जो अभी माइनस में चल रही है, उतनी ही बढ़ेगी। यह खुशबू दूर-दूर तक जाएगी और हिंसा-प्रतिहिंसा की लौह जकड़न में फंसे जनजातीय समूहों में उम्मीद की किरण पैदा करेगी। अन्यत्र कोई मॉडल खड़ा किए बिना आप दुखी और नाराज आबादियों का विश्वास नहीं जीत सकते। जैसे भूत उजाले से डरते हैं, वैसे ही सभी तरह के उग्रवादी प्रगति से घबराते हैं। यक्ष प्रश्न यह है कि यह शुरु आत वह सरकार कैसे कर सकती है, जिसके बारे में यह आम धारणा है कि यह ऐसे दागी लोगों की सरकार है जो अपने दागों पर वैसे ही रीझे हुए हैं जैसे कोई सुंदरी अपने को आईने में देख कर अपने आप पर रीझती होगी। एक बात बहुत साफ है। हिंसा और प्रतिहिंसा के दुश्चक्र से मुक्त होना परम आवश्यक है। लोकतंत्र संवाद का दशर्न है, न कि सशस्त्र युद्ध का। वर्धा संवाद की आम सहमति है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति और प्रतिरोध के लिए पर्याप्त जगह बनी रहनी चाहिए और राज्य को असहमति के स्वरों के प्रति असहिष्णुता का रवैया नहीं अपनाना चाहिए। इसके साथ ही विभिन्न जनसमूहों को राज्य की नीतियों और कार्यक्रमों से अपनी असहमति और विरोध, शांतिपूर्ण तरीकों से ही व्यक्त करने चाहिए। किसी भी तरह की हिंसा सही और न्यायोचित जन आंदोलन को भटकाव के रास्ते पर डाल देती है। समूहों की हिंसा, राज्य की दमनात्मक संस्थाओं द्वारा की जा रही हिंसा को प्राय: वैध ठहराने का बहाना बन जाती है और कई बार राज्य की एजेंसी द्वारा की गई हिंसा समूहों को प्रतिहिंसा करने का अवसर प्रदान कर देती है। अक्सर जब माओवाद की र्चचा होती है, तब बाकी देश की ट्रेजेडी को भुला दिया जाता है। एक ही देश में दो तरह की नीतियां नहीं चल सकतीं। इसलिए उग्र वामपंथ के मुद्दे पर वर्धा घोषणापत्र के इस निष्कर्ष का स्वागत होना चाहिए कि देश के विभिन्न हिस्सों में स्वाधीनता आंदोलन और भारतीय संविधान में उल्लिखित मूल्यों के खिलाफ बनाये गये और लागू किये जाने वाले कानूनों की पुनर्समीक्षा की जाए, संविधान के नीतिनिर्दे शक तत्वों में शामिल किये गये लक्ष्यों को तत्काल अमल में लाया जाए और संविधान की प्रस्तावना तथा संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों, मानवाधिकारों और नागरिक अधिकारों की रक्षा की गारंटी सुनिश्चित की जाए।
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