Tuesday, April 19, 2011

वामपंथी विचार का महत्व


जड़ मान ली गई वामपंथी विचारधारा में अभी भी प्रासंगिकता देख रहे हैं लेखक
केरल तथा पश्चिम बंगाल के चुनावों में वामपंथी सिद्धांत दांव पर है। जनता का निर्णय जो भी हो, मेरा मानना है कि वामपंथी विचारधारा की देश को महती आवश्यकता है। देश को ऐसी पार्टी चाहिए जो वास्तव में आम आदमी के पक्ष में कार्य करे, परंतु इस विचारधारा का वर्तमान ढांचा जड़ एवं अप्रासंगिक हो गया है जैसा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है। आज की दुनिया मौलिक रूप से बदल चुकी है। वर्तमान परिस्थितियों में वर्ग संघर्ष, श्रम का शोषण एवं सर्वहारा की सरकार की अवधारणा सही नहीं है। वामपंथी नायक यदि सिद्धांत में इस बदलाव को लागू नहीं कर पाएंगे तो वामपंथी विचारधारा देश से लुप्त हो जाएगी। पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजीपति लाभ कमाने के लिए उद्यम करता है। लाभ कमाने के लिए जरूरी है कि वह श्रमिक का वेतन न्यून रखे। बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ती है तो उसका प्रयास रहता है कि वेतन में कटौती करे। श्रमिक को वेतन कम मिलने से उसकी क्रयशक्ति कम हो जाती है। इससे बाजार में मांग कम हो जाती है। दूसरी ओर मशीनों के उपयोग से उत्पादन की मात्रा में वृद्धि होती है। जनता की क्रयशक्ति कम होने एवं उत्पादन की अधिकता होने के कारण बाजार में माल बिकता नहीं है। फलस्वरूप आर्थिक संकट पैदा हो जाता है, परंतु वर्तमान में ऐसा संकट नहीं दिख रहा है। भारत एवं चीन सहित तमाम विकासशील देशों में श्रम के दाम बढ़ रहे हैं, बाजार में पर्याप्त मांग बनी हुई है और आर्थिक विकास तीव्र गति से चल रहा है। कारण यह है कि मध्यम वर्ग एवं संगठित श्रमिकों के वेतन में वृद्धि हो रही है। पिछले वषरें में मनरेगा के लागू होने के कारण गरीबतम श्रमिकों के वेतन में भी कुछ वृद्धि हुई है। मा‌र्क्स ने कहा था कि प्रतिस्पर्धा के कारण श्रमिकों के वेतन में गिरावट आती जाएगी, परंतु हम इसे बढ़ता देख रहे हैं। बात यह है कि रूस और चीन की क्रांतियों से शासक वर्ग को समझ आ गया है कि श्रमिक की गरीबी दूर नहीं की गई तो संपूर्ण व्यवस्था पलट सकती है। व्यापारी द्वारा दी गई रकम खटाई में पड़ जाए तो वह आधा-तिहाई लेकर खुश हो जाता है। इसी प्रकार शासकों ने निर्णय लिया है कि संपूर्ण व्यवस्था को दांव पर लगाने के स्थान पर गरीबों के वेतन में वृद्धि को स्वीकार कर लेना चाहिए। यही कारण है कि ट्रेड यूनियन एक्ट के तहत संगठित श्रमिकों के वेतन बढ़ाए गए हैं और मनरेगा के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा ही किया जा रहा है। इस वेतन वृद्धि के कारण श्रमिक में क्रांति करने का कारण ही लुप्त हो गया है। इस बदली हुई परिस्थिति में गरीब का हित हासिल करने के लिए जरूरत क्रांति की नहीं, बल्कि सरकार पर सतत दबाव बनाने की है। जिस प्रकार मनरेगा के कारण खेत मजदूर के वेतन में वृद्धि हुई है, उसी प्रकार किसान और छोटे उद्यमियों के पक्ष में आर्थिक नीतियों को बदलने की जरूरत है। यह दबाव इंटक जैसे संगठनों द्वारा उतना ही बनाया जा रहा है जितना कि वामपंथी सीटू द्वारा। वर्ग संघर्ष के स्थान पर वर्ग तनाव से काम बन जा रहा है। मसला केवल पूंजीपति एवं श्रमिक के बीच लाभ के वितरण का रह गया है। वामपंथी सिद्धांतों में यह बदलाव करना होगा। दूसरा विषय पूंजी-सघन उत्पादन का है। वामपंथी सिद्धांत में आधुनिक ऑटोमेटिक फैक्टि्रयों का गुणगान किया जाता है। इन फैक्टि्रयों में मुट्ठी भर श्रमिक भारी मात्रा में उत्पादन कर लेते हैं। आधुनिक कपड़ा मिल में आज एक श्रमिक लगभग 1000 जुलाहों के बराबर उत्पादन कर लेता है। उत्पादन की इस प्रक्रिया से आज हर व्यक्ति को पंखा, बिजली, कागज, कॉपी, साइकिल, जूता, कपड़ा और रोटी आसानी से उपलब्ध हो गए हैं, परंतु साथ-साथ रोजगार कम हो गया है। वित्त मंत्रालय द्वारा प्रकाशित आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में संगठित श्रमिकों की संख्या 1997 में 236 लाख थी, जो कि 2005 में घटकर 214 लाख रह गई थी। इसी अवधि में आर्थिक विकास की दर पूर्व की 4 प्रतिशत से बढ़कर 8 प्रतिशत हो गई थी। उत्पादन में वृद्धि एवं रोजगार का हनन साथ-साथ चल रहा है। ऐसे में वामपंथियों द्वारा पूंजी सघन उत्पादन की वकालत करना अनुचित है। पश्चिम बंगाल में बुद्धदेव भट्टाचार्य की मा‌र्क्सवादी सरकार ने सिंगुर और नंदीग्राम में इन्हीं बड़े उद्योगों की स्थापना के लिए जनता को कष्ट दिया और भयंकर प्रतिक्रिया का सामना किया। भट्टाचार्य की सोच थी कि इन कारखानों से जनता का हित साधा जाएगा, जबकि जनता का प्रत्यक्ष अनुभव है कि इन पूंजी सघन उद्योगों से रोजगार का क्षरण ज्यादा होता है। वामपंथियों को चाहिए कि पूंजी सघन उत्पादन का समर्थन करने के स्थान पर श्रम सघन दिशा में अर्थव्यवस्था को मोड़ने की मांग करें। टेक्सटाइल मिल पर टैक्स लगाकर हथकरघे को संरक्षण देने की जरूरत है। तीसरा बिंदु सरकार की भूमिका का है। वामपंथी सिद्धांत में सरकार को समाज की धुरी के रूप में देखा जाता है। सोच है कि पूंजीवादी सरकार पूंजीपतियों के हित को बढ़ाती है, जबकि वामपंथी सरकार श्रमिक के हित को बढ़ाएगी। दोनों ही तरह से सरकार केंद्र में रहती है, परंतु रूस एवं चीन के अनुभवों से प्रमाणित होता है कि सरकार का मूल चरित्र शोषक होता है। सरकार न पूंजीपति की होती है, न श्रमिक की। इस बात को समाजशास्त्री मेक्स वेबर ने स्पष्ट रूप से कहा है। कार्ल मा‌र्क्स के वैचारिक गुरु हेगेल ने भी इस बात की पुष्टि की है। मनुस्मृति में कहा गया है कि राजा के रक्षाधिकारी अधिकतर दूसरे के धन को हरण करने वाले और वंचक होते हैं। चीन में माओ त्से तुंग ने इन्हीं भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों के विरुद्ध सांस्कृतिक क्रांति का आह्वान किया था। पश्चिम बंगाल में माकपा के वर्तमान संकट के पीछे भी पार्टी कर्मियों में व्याप्त भ्रष्टाचार है। इन सब प्रमाणों के बावजूद वामपंथी सिद्धांत में सरकार को जनता के मसीहा के रूप में पूजा जाता है। स्वार्थी पूंजीपति सरकार को हटाकर स्वार्थी वामपंथी सरकार को स्थापित करने का औचित्य नहीं है। जनता चाहती है कि उसे सरकारी तंत्र के आतंक से राहत दिलाई जाए। वामपंथी विचारकों को चाहिए कि सरकार की भूमिका को न्यून बनाने का जतन करें। देश को ऐसी पार्टी की जरूरत है जो वास्तव में आम आदमी के पक्ष में काम करे। वामपंथी सिद्धांत के मूल में यही विचार है। अत: वाम दलों को अपनी मूल धुरी को पकड़ कर अपने कार्यक्रम में समय अनुसार परिवर्तन करना चाहिए। (लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं).

Thursday, April 7, 2011

उग्र वामपंथ से कैसे निपटें


उग्र वामपंथ के मुद्दे पर वर्धा घोषणापत्र के इस निष्कर्ष का स्वागत होना चाहिए कि देश के विभिन्न हिस्सों में स्वाधीनता आंदोलन और भारतीय संविधान में उल्लिखित मूल्यों के खिलाफ बनाये गये और लागू किये जाने वाले कानूनों की पुनर्समीक्षा की जाए, संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल किये गये लक्ष्यों को तत्काल अमल में लाया जाए और संविधान की प्रस्तावना तथा संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों, मानवाधिकारों और नागरिक अधिकारों की रक्षा की गारंटी सुनिश्चित की जाए
यह खुशी की बात है कि वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय ने 'भारत में उग्र वामपंथ के मुद्दे' विषय पर एक घोषणा पत्र जारी कर समस्या के समाधान की प्रत्याशा में राष्ट्रीय पहल की है। विश्वविद्यालय के कुलपति विभूतिनारायण राय के निमंतण्रपर देश भर से आये चिंतकों और एक्टिविस्टों ने गत 30 31 मार्च को इस विषय पर गंभीर विमर्श करने के बाद सर्व सहमति से यह घोषणा पत्र जारी किया। इस महत्वपूर्ण विमर्श में न्यायमूर्ति पीवी सांवत, प्रो. राम दयाल मुंडा, असगर अली इंजीनियर, संदीप पांडेय, विभूतिनारायण राय, राधा भट्ट, वासंती रामन, शीतला सिंह, रमेश दीक्षित, आलोक धन्वा, गिरीश मिश्र, एचएस सक्सेना, प्रो. ए. अरविंदाक्षन, शम्सुल इस्लाम, प्रो. नदीम हसनैन और इलीना सेन समेत दर्जनों अध्येता शामिल थे। वर्धा घोषणापत्र की मूल मान्यता यह है कि देश के विभिन्न भागों विशेषकर जनजाति बहुल इलाकों में जनजातीय संस्कृति विकास की मौजूदा अवधारणाओं के कारण संकटग्रस्त है। विभिन्न जनजातीय समूह, भारतीय राज्य की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक नीतियों के कारण स्वयं को उपेक्षित और उत्पीड़ित महसूस करते हैं। राज्य के द्वारा जनजातीय क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन औद्योगिक कारपोरेट घरानों के हित में किए जाने के कारण भी इन क्षेत्रों की जनता, भारतीय राज्य से अपने को अलगथ लग मानने लगी है। जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय आदिवासी समूहों के स्वामित्व को राज्य द्वारा औपचारिक स्वीकृति प्रदान करने और नीति निर्माण की प्रक्रियाओं में स्थानीय जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने से ही राज्य और जनसामान्य के बीच का अलगाव खत्म किया जा सकता है। सवाल यह है कि इस दिशा में कैसे आगे बढ़ा जाए। आखिरकार संवाद ही एकमात्र रास्ता है जिस पर चलते हुए दोनों पक्ष एक-दूसरे के नजरिए को समझ सकते हैं और सहमति के बिंदु उभर सकते हैं। यह बात इस घोषणापत्र में भी दोहराई गई है। कहा गया है कि राज्य और जनजातीय समूहों के बीच बढ़ते अविश्वास और अलगाव को भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती मानते हुए राज्य और जनजातीय समूहों के बीच विभिन्न नागरिक संगठनों के माध्यम से तत्काल संवाद शुरू किये जाने की जरूरत है। इस तरह का कोई भी संवाद शुरू करने की पहल राज्य की ओर से होनी चाहिए। राज्य द्वारा चलाए जा रहे ऑपरेशन 'ग्रीन हंट' पर तत्काल रोक लगाई जाए। साथ ही हथियारबंद संगठनों को भी अपनी हिंसात्मक गतिविधियां तत्काल बंद कर देनी चाहिए। कुछ और लोगों ने भी इसी तरह की राय प्रकट की है। स्वामी अग्निवेश तो, निज की पहल पर कई कदम आगे बढ़ गए थे। मेरी समझ से यह रास्ता व्यावहारिक नहीं है। इस बारे में सचाई यही है कि कुछ समूह ऐसे होते हैं, जिनसे बातचीत हो ही नहीं सकती और की जाएगी तो उसका कोई नतीजा नहीं निकलेगा। उदाहरण के लिए, राम जन्मभूमि मंदिर वालों से कई बार बातचीत हुई। अब भी कुछ अति आशावादी लोग उम्मीद से हैं। 'जन मोर्चा' के संपादक तथा प्रेस काउंसिल के सदस्य रह चुके शीतला सिंह आजकल अयोध्या विवाद को लेकर अपने संस्मरण लिख रहे हैं। उनका मानना है कि मामला राजनीतिक हो, तो उसे बातचीत द्वारा हल करने की उम्मीद करना आत्म-छलना है। इस संबंध में एक और उदाहरण लें। कश्मीर के अलगाववादियों से बातचीत कर क्या हासिल होगा? माओवाद को किसी भी तर्क से इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इसमें जनवाद के तत्व हैं। पर मामला राजनीतिक है। दो परस्पर विरोधी राजनीतिक धाराएं एक-दूसरे से वैसे ही मिलती हैं जैसे शमशीर शमशीर से टकराती है। लेकिन संवाद की और भी शक्लें हैं। इस मामले में संवाद का तरीका यह होगा कि पहल कहीं और से की जाए। बादल आकाश में बनते हैं। तब जमीन पर बारिश होती है। इसलिए उग्र वामपंथ से निपटने के लिए जरूरी है कि विकास का काम उन जनजातीय इलाकों से शुरू किया जाए जहां तक माओवाद का असर नहीं पहुंचा है। ऐसे इलाके संख्या में अल्प नहीं हैं। न इनकी जनसंख्या उंगलियों पर गिनने लायक है। इन इलाकों में पहुंच कर सरकार दिखाए कि जनजातियों की जीवन स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए वह क्या-क्या कर सकती हैं। वहां की जनजातियां जितनी प्रसन्न होंगी, सरकार की साख, जो अभी माइनस में चल रही है, उतनी ही बढ़ेगी। यह खुशबू दूर-दूर तक जाएगी और हिंसा-प्रतिहिंसा की लौह जकड़न में फंसे जनजातीय समूहों में उम्मीद की किरण पैदा करेगी। अन्यत्र कोई मॉडल खड़ा किए बिना आप दुखी और नाराज आबादियों का विश्वास नहीं जीत सकते। जैसे भूत उजाले से डरते हैं, वैसे ही सभी तरह के उग्रवादी प्रगति से घबराते हैं। यक्ष प्रश्न यह है कि यह शुरु आत वह सरकार कैसे कर सकती है, जिसके बारे में यह आम धारणा है कि यह ऐसे दागी लोगों की सरकार है जो अपने दागों पर वैसे ही रीझे हुए हैं जैसे कोई सुंदरी अपने को आईने में देख कर अपने आप पर रीझती होगी। एक बात बहुत साफ है। हिंसा और प्रतिहिंसा के दुश्चक्र से मुक्त होना परम आवश्यक है। लोकतंत्र संवाद का दशर्न है, न कि सशस्त्र युद्ध का। वर्धा संवाद की आम सहमति है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति और प्रतिरोध के लिए पर्याप्त जगह बनी रहनी चाहिए और राज्य को असहमति के स्वरों के प्रति असहिष्णुता का रवैया नहीं अपनाना चाहिए। इसके साथ ही विभिन्न जनसमूहों को राज्य की नीतियों और कार्यक्रमों से अपनी असहमति और विरोध, शांतिपूर्ण तरीकों से ही व्यक्त करने चाहिए। किसी भी तरह की हिंसा सही और न्यायोचित जन आंदोलन को भटकाव के रास्ते पर डाल देती है। समूहों की हिंसा, राज्य की दमनात्मक संस्थाओं द्वारा की जा रही हिंसा को प्राय: वैध ठहराने का बहाना बन जाती है और कई बार राज्य की एजेंसी द्वारा की गई हिंसा समूहों को प्रतिहिंसा करने का अवसर प्रदान कर देती है। अक्सर जब माओवाद की र्चचा होती है, तब बाकी देश की ट्रेजेडी को भुला दिया जाता है। एक ही देश में दो तरह की नीतियां नहीं चल सकतीं। इसलिए उग्र वामपंथ के मुद्दे पर वर्धा घोषणापत्र के इस निष्कर्ष का स्वागत होना चाहिए कि देश के विभिन्न हिस्सों में स्वाधीनता आंदोलन और भारतीय संविधान में उल्लिखित मूल्यों के खिलाफ बनाये गये और लागू किये जाने वाले कानूनों की पुनर्समीक्षा की जाए, संविधान के नीतिनिर्दे शक तत्वों में शामिल किये गये लक्ष्यों को तत्काल अमल में लाया जाए और संविधान की प्रस्तावना तथा संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों, मानवाधिकारों और नागरिक अधिकारों की रक्षा की गारंटी सुनिश्चित की जाए।